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नोबेल पुरस्कार के बाद ट्रंप नाराज
वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। यह फैसला शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को उस समय सामने आया, जब कुछ घंटे पहले ही दक्षिण अफ्रीका की प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और पूर्व अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीश नावी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान हुआ था। ट्रंप लंबे समय से इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को हासिल करने की इच्छा जताते रहे हैं। हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने प्रतिबंधों का आधिकारिक कारण ICC की अमेरिका और इजरायल से जुड़ी जांच को बताया है।
नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नावी पिल्लई की आलोचना करने वाली एक पोस्ट साझा की। इस पोस्ट में नोबेल समिति के फैसले पर सवाल उठाए गए थे। पिल्लई को पुरस्कार मिलने और ICC पर प्रतिबंध लगाए जाने के समय को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।
मार्क रुबियो ने ICC को दी चेतावनी
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो ने प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने नागरिकों, सैनिकों और राजनीतिक नेताओं को ICC के अधिकार क्षेत्र में नहीं मानता। रुबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ICC के साथ वित्तीय लेनदेन पर रोक लगाएगा और न्यायालय की आर्थिक गतिविधियों को सीमित करने के लिए कदम उठाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि न्यायालय ने अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखी, तो वॉशिंगटन उसके खिलाफ और कठोर कदम उठा सकता है।
ICC पर प्रतिबंध से क्या होगा असर?
ट्रंप प्रशासन के नए प्रतिबंधों के तहत ICC की अमेरिकी वित्तीय सेवाओं, तकनीकी कंपनियों और डॉलर आधारित लेनदेन तक पहुंच प्रभावित होगी। अमेरिकी कंपनियों और व्यक्तियों को न्यायालय के साथ मौजूदा कारोबारी संबंध समाप्त करने के लिए छह महीने का समय दिया गया है।
इस फैसले से न्यायालय के दैनिक संचालन, तकनीकी सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय जांच संबंधी गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है। हालांकि ICC ने स्पष्ट किया है कि वह दबाव के बावजूद अपना काम जारी रखेगा।
नावी पिल्लई को मिला नोबेल शांति पुरस्कार
दक्षिण अफ्रीका की 85 वर्षीय न्यायविद् नावी पिल्लई को अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान के लिए वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। पिल्लई संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में भी सेवाएं दे चुकी हैं। उन्होंने गाजा में कथित युद्ध अपराधों और मानवाधिकार उल्लंघनों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की जांच का नेतृत्व किया था। उस जांच के निष्कर्षों को इजरायल ने खारिज किया था।
अमेरिका और ICC के बीच क्यों है विवाद?
अमेरिका लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताता रहा है। अमेरिका और इजरायल दोनों ही ICC की स्थापना करने वाली रोम संविधि के सदस्य नहीं हैं।
इसके बावजूद न्यायालय ने अफगानिस्तान में कथित युद्ध अपराधों और गाजा संघर्ष से जुड़े मामलों में कार्रवाई की है। ICC ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए थे। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई कर रहा है। दूसरी ओर ICC का तर्क है कि उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों में हुए गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों की जांच की जा सकती है।
यूरोपीय देशों ने जताई नाराजगी
अमेरिका के इस फैसले पर कई देशों ने विरोध दर्ज कराया है। कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, ब्रिटेन, डेनमार्क और नीदरलैंड ने संयुक्त बयान जारी कर ICC के समर्थन की बात कही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों की निंदा की है। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप प्रशासन के फैसले का समर्थन किया है।
अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था पर बढ़ी चिंता
ICC की अध्यक्ष तोमोको अकाने ने कहा है कि न्यायालय स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ अपना काम जारी रखेगा। उन्होंने सदस्य देशों से अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था की रक्षा के लिए समर्थन देने की अपील की है। अमेरिका के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय कानून और राष्ट्रीय संप्रभुता को लेकर बहस और तेज हो गई है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि प्रतिबंधों का न्यायालय की लंबित जांचों पर कितना असर पड़ेगा। लेकिन इस फैसले ने अमेरिका और उसके कई सहयोगी देशों के बीच नए कूटनीतिक मतभेद पैदा कर दिए हैं।
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