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ईरान पर सख्ती के बीच ट्रंप की चुनावी अपील
वॉशिंगटन: अमेरिका में मध्यावधि चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मतदाताओं से रिपब्लिकन उम्मीदवारों को जिताने की अपील की है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में उन्होंने अपनी सरकार की आर्थिक नीतियों और ईरान के खिलाफ उठाए गए कदमों का बचाव किया। आयोवा में आयोजित रैली में ट्रंप ने समर्थकों से मतदान के लिए निकलने का आह्वान करते हुए कांग्रेस में पार्टी की ताकत बनाए रखने पर जोर दिया। हालांकि, दिए गए शीर्षक में शामिल ‘ईरान को काबू में रखने के लिए बहुमत चाहिए’ वाक्य की शब्दशः स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली है।
तीन नवंबर को होने वाले इन चुनावों में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं हो रहा है। मुकाबला अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण को लेकर है। प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। इनके नतीजे तय करेंगे कि ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल के शेष दो वर्षों में अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए कितना संसदीय समर्थन जुटा पाएंगे। इसलिए राष्ट्रपति स्वयं उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद प्रचार में सक्रिय रहे हैं।
ट्रंप ने रविवार, एक नवंबर को आयोवा के डब्यूक में रिपब्लिकन समर्थकों को संबोधित किया। उन्होंने पार्टी की बड़ी जीत का दावा किया और डेमोक्रेट उम्मीदवारों को समर्थन देने के खिलाफ मतदाताओं को आगाह किया। उनके भाषण में स्थानीय चुनावी मुकाबलों के साथ राष्ट्रीय राजनीति, आर्थिक नीतियों और ईरान युद्ध का उल्लेख रहा। उन्होंने कहा कि विपक्ष को मजबूत करने से उनके प्रशासन के एजेंडे को नुकसान पहुंच सकता है। रैली में रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने भी मतदाताओं से पार्टी के पक्ष में एकजुट होने की अपील की। ईरान को लेकर ट्रंप का रुख चुनाव प्रचार के दौरान सख्त बना रहा। उन्होंने आयोवा की सभा में संकेत दिया कि बातचीत में प्रगति नहीं होने पर अमेरिका आगे कठोर कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, ऐसी चेतावनी को किसी नए सैन्य अभियान की औपचारिक घोषणा नहीं माना जा सकता। उनके बयानों के समानांतर कूटनीतिक प्रयासों की खबरें भी सामने आई हैं। इस तरह चुनाव से ठीक पहले ईरान नीति में सैन्य दबाव और बातचीत, दोनों पहलू चर्चा में बने रहे।
इससे पहले आठ अक्टूबर को ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका तीन नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करेगा। उन्होंने उस समय दोनों देशों के बीच बातचीत को उपयोगी बताया था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध और उससे जुड़े खर्च अमेरिकी चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गए हैं। ऊंची ईंधन कीमतों के कारण रिपब्लिकन उम्मीदवारों को मतदाताओं के सवालों का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप ने चुनाव के बाद तेल कीमतों में गिरावट आने की उम्मीद भी जताई थी। रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती केवल विदेश नीति पर अपनी स्थिति समझाने की नहीं है। मतदाताओं के सामने रोजमर्रा का खर्च, महंगाई, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत जैसे मुद्दे भी हैं। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में डेमोक्रेट उम्मीदवारों ने आर्थिक परेशानियों और ईरान युद्ध के प्रभाव को प्रमुखता दी। दूसरी ओर ट्रंप अपनी आर्थिक नीतियों का बचाव करते हुए कम ईंधन कीमतों का भरोसा दिलाते रहे। चुनावी बहस में अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और घरेलू आर्थिक स्थिति एक-दूसरे से जुड़े मुद्दों के रूप में उभरे हैं।
ईरान युद्ध को लेकर रिपब्लिकन खेमे में भी सभी सांसदों का रुख एक जैसा नहीं रहा है। आयोवा की सांसद मैरिएनेट मिलर-मीक्स और जैक नन ने हाल में राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर अंकुश लगाने तथा युद्ध समाप्त करने के प्रयास का समर्थन किया था। इसके बावजूद दोनों डब्यूक की रैली में ट्रंप के साथ मंच पर मौजूद रहे। नन ने कांग्रेस में ऐसे बहुमत की जरूरत बताई जो राष्ट्रपति के साथ काम करने के साथ व्यावहारिक तरीके से उनकी जवाबदेही भी तय करे। कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां जारी हैं। ट्रंप ने एक नवंबर को बताया कि उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बातचीत की थी और उसमें ईरान का विषय शामिल था। उन्होंने बातचीत के विस्तृत ब्योरे सार्वजनिक नहीं किए। दूसरी ओर कतरी मध्यस्थों के जरिए ईरानी अधिकारियों के साथ संपर्क की खबरें सामने आईं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि उनका देश रक्षा और कूटनीति, दोनों के लिए तैयार है। इससे स्पष्ट है कि सैन्य चेतावनियों के बीच बातचीत के रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।
कांग्रेस के किसी सदन में डेमोक्रेट बहुमत आने पर ट्रंप प्रशासन के लिए विधेयक पारित कराना और बजट संबंधी प्राथमिकताएं आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है। प्रतिनिधि सभा में विपक्ष की ताकत बढ़ने से प्रशासन के कामकाज की जांच और निगरानी भी बढ़ सकती है। वहीं सीनेट वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों तथा न्यायाधीशों की नियुक्तियों की पुष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, संसदीय बहुमत में बदलाव होने से ट्रंप राष्ट्रपति पद नहीं खोएंगे और उनकी कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी। चुनाव की पूर्व संध्या तक ट्रंप रिपब्लिकन समर्थन जुटाने और अपनी नीतियों का बचाव करने में लगे रहे। रॉयटर्स के अनुसार, स्वतंत्र चुनाव विश्लेषक प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटों की संभावनाओं को बेहतर और सीनेट के मुकाबले को प्रतिस्पर्धी मान रहे थे। ये अनुमान हैं, चुनाव परिणाम नहीं। अब मतदाताओं का फैसला तय करेगा कि कांग्रेस में शक्ति संतुलन किस ओर जाता है और ट्रंप को अपने घरेलू एजेंडे तथा ईरान नीति को लेकर कितनी राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ता है।
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