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Washington वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को कहा कि नाटो के अधिकांश सहयोगी देशों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इस पर उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि अमेरिका को किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं है। ट्रंप ने एक बयान में कहा, “हमें हमारे ज्यादातर नाटो सहयोगियों ने बताया है कि वे ईरान के ‘आतंकी शासन’ के खिलाफ हमारे सैन्य अभियान में शामिल नहीं होना चाहते।” हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि लगभग सभी देश इस बात से सहमत हैं कि ईरान को किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाना चाहिए।
नाटो देशों के रुख पर ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस प्रतिक्रिया से हैरानी नहीं हुई। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा मानता रहा हूं कि नाटो एकतरफा व्यवस्था है, हम उनकी रक्षा करते हैं, लेकिन जरूरत के समय वे हमारे लिए कुछ नहीं करते। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान की सैन्य क्षमता को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। उन्होंने कहा, “हमने ईरान की नौसेना, वायुसेना, एयर डिफेंस और रडार सिस्टम को खत्म कर दिया है, और उनके शीर्ष नेतृत्व को भी लगभग समाप्त कर दिया है।”
उन्होंने कहा कि इन सैन्य सफलताओं के बाद अब सहयोगियों की मदद की जरूरत नहीं रही। उन्होंने कहा, “हम अब नाटो देशों की सहायता न तो चाहते हैं और न ही जरूरत है—हमें कभी थी भी नहीं। ट्रंप ने जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई साझेदारों को लेकर भी यही रुख दोहराया और कहा, “हमें किसी की मदद की जरूरत नहीं है। उन्होंने एक दिन पहले ओवल ऑफिस में भी सहयोगी देशों के रवैये पर नाराजगी जताई थी। ब्रिटेन का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने कुछ युद्धपोत और माइनस्वीपर भेजने का अनुरोध किया था, लेकिन जवाब उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला।
ट्रंप ने कहा, “मैंने बाद में कहा कि अब उनकी जरूरत नहीं है। मुझे मदद शुरुआत में चाहिए थी, जीत के बाद नहीं। उन्होंने विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभा रहा है। गौरतलब है कि 1949 में स्थापित नाटो सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है, जिसमें अमेरिका सबसे बड़ा सैन्य और वित्तीय योगदानकर्ता है। रक्षा खर्च और जिम्मेदारी के बंटवारे को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति का अहम मुद्दा रहा है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने 2015 के ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया था, यह कहते हुए कि यह समझौता ईरान को स्थायी रूप से परमाणु हथियार बनाने से नहीं रोकता।
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