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मैड्रिड : पेट और उससे जुड़े कुछ प्रकार के उन्नत कैंसर के इलाज में एक प्रयोगात्मक दवा के उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। सोनेसिटाटुग वेडोटिन नाम की दवा के अध्ययन में तीसरे या उसके बाद के चरण का उपचार ले रहे मरीजों में मृत्यु का सापेक्ष जोखिम 53 प्रतिशत कम पाया गया। इस समूह में मध्यिका जीवित रहने की अवधि पांच महीने से बढ़कर दस महीने रही। हालांकि, यह परिणाम चुनिंदा मरीजों के समूह से जुड़ा है। इसे हर मरीज की जिंदगी दोगुनी होने या कैंसर पूरी तरह ठीक होने की गारंटी नहीं माना जा सकता।
दवा का परीक्षण अंतरराष्ट्रीय तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल ‘क्लैरिटी-गैस्ट्रिक01’ में किया गया। परिणाम 25 अक्टूबर 2026 को स्पेन के मैड्रिड में आयोजित यूरोपियन सोसाइटी फॉर मेडिकल ऑन्कोलॉजी के सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए। अध्ययन में ऐसे मरीज शामिल थे, जिनका कैंसर स्थानीय रूप से काफी बढ़ चुका था या शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल गया था। इनके ट्यूमर में क्लॉडिन 18.2 नामक प्रोटीन की मौजूदगी निर्धारित स्तर पर होना भी जरूरी था।
अध्ययन की पूरी आबादी में, जिसमें दूसरा या उसके बाद का उपचार ले रहे मरीज शामिल थे, मृत्यु का सापेक्ष जोखिम 42 प्रतिशत कम मिला। इनमें मध्यिका जीवित रहने की अवधि नई दवा के साथ 10.6 महीने और तुलना वाले उपचार के साथ 6.4 महीने रही। इसलिए 53 प्रतिशत वाला आंकड़ा विशेष रूप से तीसरे या उसके बाद का उपचार लेने वाले समूह का है। दोनों परिणामों को एक जैसा बताना सही नहीं होगा।
‘जिंदगी दोगुनी’ का क्या है मतलब?
कैंसर शोध में मध्यिका जीवित रहने की अवधि एक सांख्यिकीय माप है। इसका अर्थ वह समय है, जिस तक अध्ययन के किसी समूह के आधे मरीज जीवित रहते हैं। यह सभी मरीजों की औसत उम्र नहीं बताता और किसी व्यक्ति के भविष्य की निश्चित समयसीमा भी नहीं है। कुछ मरीज इससे कम और कुछ अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं। इसलिए पांच से दस महीने का परिणाम उपचार समूहों के बीच अंतर बताता है, किसी एक मरीज की तय जीवन अवधि नहीं।
इसी तरह मृत्यु का जोखिम 53 प्रतिशत घटने का मतलब यह नहीं कि सौ में से 53 मरीज निश्चित रूप से बच गए। यह अध्ययन के दौरान दोनों उपचार समूहों में मृत्यु की दरों की तुलना से निकला सापेक्ष आंकड़ा है। मरीज और परिजन जब ऐसी खबर पढ़ें तो उन्हें यह देखना चाहिए कि तुलना किस उपचार से हुई, किस अवस्था के मरीज शामिल थे और परिणाम किस समूह के लिए बताए गए हैं।
किस तरह काम करती है दवा?
सोनेसिटाटुग वेडोटिन ‘एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट’ श्रेणी की दवा है। इस तकनीक में एक एंटीबॉडी के साथ कैंसर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली दवा जोड़ी जाती है। एंटीबॉडी का काम कोशिकाओं पर मौजूद खास लक्ष्य को पहचानना है। इससे दवा को संबंधित कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद मिलती है। हालांकि, इस तरह का लक्षित उपचार भी दुष्प्रभावों से पूरी तरह मुक्त नहीं होता। स्वस्थ ऊतकों पर असर पड़ने की संभावना बनी रह सकती है।
हर मरीज के लिए एक जैसा विकल्प नहीं
कैंसर का नाम समान होने पर भी दो मरीजों के ट्यूमर की जैविक विशेषताएं अलग हो सकती हैं। बायोमार्कर जांच से ट्यूमर में मौजूद कुछ प्रोटीन, जीन या दूसरे संकेतों की जानकारी मिलती है। इससे चिकित्सक यह समझने की कोशिश करते हैं कि कोई लक्षित उपचार उपयोगी हो सकता है या नहीं। केवल पेट के कैंसर का निदान होना किसी खास दवा के लिए पात्रता तय नहीं करता। बीमारी की अवस्था और पहले मिले उपचार भी महत्वपूर्ण हैं।
बायोमार्कर मिल जाने के बावजूद उपचार से लाभ निश्चित नहीं होता। मरीज की समग्र स्थिति, दूसरी बीमारियां और उपचार सहने की क्षमता जैसे पहलुओं का मूल्यांकन भी जरूरी होता है। जांच रिपोर्ट का अर्थ समझने और उसके आधार पर विकल्प चुनने का काम कैंसर विशेषज्ञ के साथ होना चाहिए। किसी समाचार में अच्छे परिणाम पढ़कर मौजूदा उपचार अपने आप बंद करना उचित नहीं है।
अध्ययन की सीमाएं भी महत्वपूर्ण
इस परीक्षण में कुल जीवित रहने की अवधि में लाभ मिला, लेकिन बीमारी बढ़े बिना जीवित रहने की अवधि से जुड़ा दूसरा प्रमुख परिणाम स्वतंत्र समीक्षा में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण स्तर तक नहीं पहुंचा। यह अंतर नतीजों की व्याख्या में जरूरी है। सकारात्मक परिणामों के साथ यह भी देखना होता है कि अध्ययन अपने किन लक्ष्यों पर सफल रहा और किन पर स्पष्ट लाभ साबित नहीं हो सका।
तीसरे चरण के परीक्षण में नए उपचार की तुलना उपलब्ध उपचार से की जाती है। शोधकर्ता प्रभावशीलता के साथ सुरक्षा और दुष्प्रभावों का भी आकलन करते हैं। सकारात्मक परीक्षण परिणाम अपने आप किसी दवा की हर देश में मंजूरी या तत्काल उपलब्धता की पुष्टि नहीं करते। उसके लिए संबंधित नियामकीय प्रक्रिया अलग होती है। फिलहाल ये नतीजे चुनिंदा उन्नत कैंसर मरीजों के लिए एक संभावित नए विकल्प की उम्मीद बढ़ाते हैं।
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