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युद्ध अभ्यास में पहाड़ से रेगिस्तान तक सैनिकों की ट्रेनिंग

Ratna Netam
22 Sept 2026 8:06 PM IST
युद्ध अभ्यास में पहाड़ से रेगिस्तान तक सैनिकों की ट्रेनिंग
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नई दिल्ली। भारत और अमेरिका की सेनाएं संयुक्त सैन्य अभ्यास **‘युद्ध अभ्यास 2026’** के तहत अलग-अलग भौगोलिक और ऑपरेशनल परिस्थितियों में गहन प्रशिक्षण कर रही हैं। 22वें संस्करण की शुरुआत 15 सितंबर को हुई थी। इस बार अभ्यास उत्तराखंड के औली और राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में एक साथ आयोजित किया जा रहा है। दोनों देशों के करीब 600-600 सैनिक इसमें हिस्सा ले रहे हैं।इस सैन्य अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारतीय और अमेरिकी सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी साथ मिलकर सैन्य अभियान चलाने की क्षमता को बेहतर बनाना है। इसके अलावा संयुक्त योजना, कॉम्बैट टैक्टिक्स, तकनीक के इस्तेमाल और अलग-अलग ऑपरेशनल परिस्थितियों में समन्वय को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
औली और महाजन में एक साथ अभ्यास
युद्ध अभ्यास 2026 की खास बात यह है कि ट्रेनिंग उत्तराखंड के ऊंचाई वाले औली क्षेत्र के साथ राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में भी हो रही है। औली में पर्वतीय और ठंडे मौसम की परिस्थितियों में ऑपरेशन पर ध्यान दिया जा रहा है, जबकि महाजन में आधुनिक हथियार प्रणालियों और फायर पावर से जुड़े प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है।भारतीय रक्षा मंत्रालय के अनुसार अभ्यास का उद्देश्य पर्वतीय और अर्ध-पर्वतीय इलाकों में इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स की संयुक्त सैन्य क्षमता बढ़ाना है। इसमें विशेष रूप से इन्फैंट्री आधारित ऑपरेशन पर जोर दिया जा रहा है।
1200 जवान ले रहे हिस्सा
अभ्यास में भारत और अमेरिका के करीब 1,200 सैन्यकर्मी शामिल हैं। उद्घाटन समारोह औली फॉरेन ट्रेनिंग नोड में हुआ था। इसमें भारतीय सेना की 14 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल अमरेश गुंजन और अमेरिकी सेना की 11वीं एयरबोर्न डिवीजन से जुड़े कर्नल बेंजामिन जैकमैन ने दोनों देशों के सैन्य दलों को संबोधित किया।अमेरिकी दल में 11वीं एयरबोर्न डिवीजन के ‘Arctic Angels’ से जुड़े सैनिक भी शामिल हैं। यह यूनिट कठिन और ठंडे वातावरण में सैन्य अभियानों के अनुभव के लिए जानी जाती है।
ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम का इस्तेमाल
आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल इस बार के युद्ध अभ्यास का प्रमुख हिस्सा है। दोनों सेनाएं निगरानी और टोही के लिए ड्रोन तथा ऑटोनॉमस सिस्टम के उपयोग का प्रशिक्षण ले रही हैं। महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में समकालीन हथियार प्रणालियों का प्रदर्शन भी अभ्यास में शामिल है।युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए ड्रोन, साइबर क्षमताओं और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का महत्व लगातार बढ़ रहा है। दोनों देशों के सैन्य विशेषज्ञ उभरती तकनीकों और आधुनिक युद्धक्षेत्र में उनके इस्तेमाल से जुड़े अनुभवों का आदान-प्रदान भी कर रहे हैं।
काउंटर ड्रोन ट्रेनिंग पर भी फोकस
अमेरिकी सेना के अनुसार प्रशिक्षण में काउंटर-अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम यानी दुश्मन के ड्रोन को पहचानने और उनका मुकाबला करने से संबंधित अभ्यास भी शामिल है। इसके अलावा ब्रिगेड स्तर का कमांड पोस्ट अभ्यास, फील्ड ट्रेनिंग, विशेषज्ञ चर्चाएं और अलग-अलग परिस्थितियों में सैन्य कार्रवाई का प्रशिक्षण हो रहा है।औली में पर्वतीय युद्ध और ठंडे मौसम में ऑपरेशन का अभ्यास भी कार्यक्रम का हिस्सा है। सैनिकों को ऐसे वातावरण में संयुक्त रूप से काम करने का मौका मिल रहा है, जहां भौगोलिक परिस्थितियां सैन्य अभियान को अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं।
क्लोज क्वार्टर ऑपरेशन का अभ्यास
औली में दोनों सेनाओं के जवानों ने काउंटर-टेररिज्म से जुड़ी ट्रेनिंग भी की है। इसमें इमारतों को सुरक्षित करने और कमरों में प्रवेश से जुड़े क्लोज क्वार्टर ऑपरेशन शामिल रहे। इस दौरान ड्रोन, रोबोटिक डॉग, प्रशिक्षित सैन्य कुत्तों और स्नाइपर सहायता जैसी क्षमताओं का भी इस्तेमाल किया गया।इस तरह के अभ्यास का उद्देश्य दोनों सेनाओं को एक-दूसरे की रणनीति, उपकरण और प्रक्रियाओं को समझने का अवसर देना है, ताकि जरूरत पड़ने पर संयुक्त कार्रवाई में बेहतर तालमेल बनाया जा सके।
HIMARS और Stinger भी अभ्यास का हिस्सा
अमेरिकी सेना के अनुसार महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में होने वाले लाइव-फायर अभ्यास में हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम यानी HIMARS और Stinger सहित आधुनिक सैन्य प्रणालियां शामिल हैं। इसके अलावा M-LIDS काउंटर-ड्रोन सिस्टम का प्रशिक्षण भी निर्धारित है।इससे सैनिकों को आधुनिक हथियार प्रणालियों की क्षमताओं और अलग-अलग परिस्थितियों में उनके इस्तेमाल को समझने का मौका मिल रहा है।
स्पेस साइबर और मल्टी-डोमेन वारफेयर पर चर्चा
युद्ध अभ्यास केवल जमीनी प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। भारत और अमेरिका के सैन्य विशेषज्ञ स्पेस, साइबर और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन जैसे क्षेत्रों पर भी चर्चा कर रहे हैं। आधुनिक सैन्य संघर्षों में जमीन, हवा और समुद्र के साथ साइबर तथा अंतरिक्ष क्षमताओं का महत्व बढ़ा है।अभ्यास में Subject Matter Expert Exchanges के माध्यम से दोनों सेनाओं के अधिकारी अपने अनुभव और सैन्य प्रक्रियाएं साझा कर रहे हैं। इसका उद्देश्य नई तकनीकों और बदलते युद्ध के तरीकों को बेहतर ढंग से समझना है।
साझा रणनीति और प्रक्रियाओं पर जोर
भारतीय रक्षा मंत्रालय के अनुसार युद्ध अभ्यास दोनों सेनाओं को अपनी रणनीति, तकनीक और प्रक्रियाओं को साझा करने का अवसर देता है। इससे अलग-अलग भूभाग और ऑपरेशनल परिस्थितियों में समन्वित सैन्य अभियान चलाने की क्षमता बेहतर करने का लक्ष्य है।प्रशिक्षण को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। शुरुआती विशेषज्ञ चर्चाओं और कमांड पोस्ट अभ्यास के बाद सैनिक अधिक जटिल फील्ड परिस्थितियों और लाइव-फायर अभ्यास की ओर बढ़ रहे हैं।
2004 से आयोजित हो रहा युद्ध अभ्यास
भारत और अमेरिका के बीच युद्ध अभ्यास की शुरुआत 2004 में हुई थी। समय के साथ इसका दायरा बढ़ा है और इसमें काउंटर-इंसर्जेंसी तथा काउंटर-टेररिज्म प्रशिक्षण से आगे बढ़कर बड़े फील्ड अभ्यास, कमांड पोस्ट ऑपरेशन, आधुनिक तकनीक और मल्टी-डोमेन वारफेयर को शामिल किया गया है।2026 का संस्करण 28 सितंबर को औपचारिक समापन समारोह के साथ पूरा होने वाला है। तब तक दोनों देशों की सेनाएं अलग-अलग सैन्य परिस्थितियों में संयुक्त प्रशिक्षण और तकनीकी आदान-प्रदान जारी रखेंगी।
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