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बीबी के डर से घर नहीं जाते थे अमेरिका के ये प्रेसीडेंट, आज भी माना जाता है इनकी पत्नी को इतिहास की सबसे लालची महिला

Gulabi
6 Nov 2020 9:01 AM GMT
बीबी के डर से घर नहीं जाते थे अमेरिका के ये प्रेसीडेंट, आज भी माना जाता है इनकी पत्नी को इतिहास की सबसे लालची महिला
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06 नवंबर 1860 अब्राहम लिंकन अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बने थे. वो अमेरिका के सबसे सफल राष्ट्रपतियों में गिने जाते हैं

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। 06 नवंबर 1860 अब्राहम लिंकन (Abraham Lincoln) अमेरिका (America) के 16वें राष्ट्रपति (President of USA) बने थे. वो अमेरिका के सबसे सफल राष्ट्रपतियों में गिने जाते हैं. उनकी सादगी, कर्मठता और ईमानदारी के लिए आज भी याद किया जाता है. उससे भी बड़ी बात थी, उनका बेहद गरीब पृष्ठभूमि से निकलते हुए राष्ट्रपति की गद्दी पर पहुंचना.

अब्राहम लिंकन जितने सरल-सहज थे. उनकी बीवी उतनी ही लड़ाकू, खुदगर्ज और लालची. उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपतियों के इतिहास में सबसे लालची पत्नी के रूप में भी याद किया जाता है. लिंकन के कुछ जीवनीलेखकों ने तो यहां तक लिख दिया है कि उनकी पत्नी उनसे लगातार लड़ती ही नहीं थी बल्कि कई बार वो पत्नी की हाथापाई के भी शिकार बने.

कुल मिलाकर लिंकन का दांपत्यजीवन खासा कलहपूर्ण था. वो अपनी बीवी से डरते भी बहुत थे. पत्नी से बचने के लिए वो अक्सर अपने ही आफिस में सो जाते थे. लिंकन के बारे में उनके जीवनीकारों ने लिखा कि उन्होंने ताजिंदगी खुद को पत्नी से परेशान पाया.

बेमेल शादी

लिंकन ने मैरी टाड के साथ बेमन से शादी की थी. ये जानते हुए भी कि दोनों एक दूसरे के एकदम उलट हैं. एक बार उनकी सगाई टूट भी गई, लेकिन मैरी आमादा थीं कि वो शादी करेंगी तो उन्हीं से. येन-केन प्रकारेण उन्होंने ऐसा कर भी लिया. किताब 'लिंकन द अननोन' में लेखक डेल कारनेगी लिखते हैं कि लिंकन ने जब पहली बार सगाई तोड़ी थी तो उनका यही मानना था कि अगर शादी हुई तो विनाशकारी होगी.

पत्नी से बचने के लिए घर से दूर रहने की कोशिश करते थे

इसे नियति ही कहना चाहिए कि उनकी शादी मैरी से ही हुई, जो विनाशकारी ही रही. मैरी जितनी आक्रमक और कलहपूर्ण थीं. वह उतने ही शांत और साधारण थे. पत्नी से बचने के लिए आमतौर पर घर से दूर रहने की कोशिश करते थे. रातें आफिस में बिताते थे. न जाने कैसे मैरी को ये आत्मविश्वास था कि उनका पति एक दिन जरूर अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा.

जब रिपब्लिकन पार्टी ने नामांकन किया तो वो करीब अनजान थे

जब लिंकन वकालत कर रहे थे तभी उनकी ख्याति जबरदस्त वक्ता के रूप में होनी लगी. उनके भाषण सत्यनिष्ठा और तर्कों से भरपूर थे. प्रभावित करने वाले. दासप्रथा को लेकर जब अमेरिका का दक्षिणी हिस्सा जल रहा था.

तब 1860 में जब शिकागो में नवगठित रिपब्लिकन पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का चयन किया तो लिंकन के नाम की कोई संभावना ही नहीं थी. एक से मजबूत एक दावेदार थे, घंटों के वादविवाद और गुटबाजी के चलते जब लिंकन के नाम का नामांकन हुआ तो लोग हैरान रह गए. कोई उन्हें नहीं जानता था.


ज्यादातर चुनाव हारे थे लिंकन

उनके नाम पर आमतौर पर यही प्रतिक्रिया होती थी कि रिपब्लिकन खुद अपनी कब्र खुदवाना चाहते हैं, लेकिन लिंकन की बातें जनता के दिलों तक पहुंच रही थीं. जनता को प्रभावित कर रही थीं. वह भाषणों में कहते थे, 'अगर दासता गलत नहीं है तो कुछ भी गलत नहीं है'. वह चुनाव जीते और राष्ट्रपति बने. हालांकि इससे पहले उन्होंने अपनी जिंदगी में जितने चुनाव लड़े थे, सबमें उनकी हार हुई थी. एक जनवरी 1963 के दिन उन्होंने दासप्रथा के खिलाफ राष्ट्रपति के तौर पर कानून पर हस्ताक्षर किए.

उनके सहयोगी चाहते थे कि वो फेल हो जाएं

ये उन्हीं का कार्यकाल था, जब दास प्रथा के मुद्दे पर अमेरिका जलने लगा. देश ऐसे गृहयुद्ध से घिर गया कि खुलेआम कहा जाने लगा अब अमेरिका को टुकड़ों में बंटने से कोई नहीं बचा सकता. तब उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों और सेना के उच्चाधिकारियों का बड़ा वर्ग उन्हें नाकाम होते देखना चाहता था.


उनकी सरकार में ही उनके कामों में रुकावट डालने वालों की कोई कमी नहीं थी. लेकिन उस हालात में भी उनकी दृढ़ता देखते बनती थी. सूझबूझ और सत्य मार्ग पर टिके रहने की दृढ़ता ने उन्हें ऐसा नायक बना दिया, जो हमेशा के लिए अमर हो गया. हालांकि दास प्रथा खत्म होने से नाराज़ एक सनकी शख्स ने उनकी हत्या भी कर दी.

उनकी हत्या की खबर पर विरोधी भी रो पड़े

ये उनके जीवन की जीत थी कि उनके जबरदस्त विरोधी और सहयोगी भी उनकी हत्या की खबर सुनकर रो पड़े थे. धीरे धीरे लोग महसूस करने लगे कि लिंकन वाकई बड़े और महान शख्स थे. प्रबल विरोध के बीच भी अपनी बात कैसे समझाई जा सकती है, कैसे विरोधियों को भी साथ लेकर चला जाता है, किस तरह क्षमा जैसा पहलू आपको मानवीय बनाता है, ये बातें लिंकन से सीखी जानी चाहिए. लिंकन ने कई बार जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं के सामने खुद को वैसे ही छोड़ा जैसे कोई खुद को नदी के प्रवाह में छोड़ देता है.

हालात जो भी हो लगातार काम में डूबे रहते थे

उनका जीवन, सादगी, मानवता, धैर्य और सत्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल था कि हैरानी हो सकती है कि क्या कोई भी मनुष्य ऐसा भी हो सकता है. जीवन का बड़ा हिस्सा लगातार प्रतिकूल हालात से टकराते हुए बीता. घर से बाहर तक. इसके बाद भी वह जिस सहजता के साथ जीवन मूल्यों पर विश्वास करते रहे, वैसा उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिले.

वो अलबेले मानव थे. अलबेले राजनीतिज्ञ. सबसे ऊपर प्रेरणादायी महान हस्ती. उनकी सारी जिंदगी गहन विषाद, उदासी और निराशा में बीती, फिर भी उन्होंने किसी के लिए खुद में कटुता नहीं पैदा होने दी. वह उदासी में डूबते रहते थे. लगातार नाकाम होते थे. लेकिन फिर उतने ही धैर्य से अगले काम में लग जाते थे.

15 साल की उम्र में सीखा वर्णमाला का पहला शब्द

लिंकन की पैदाइश ऐसे घर में हुई जहां घोर गरीबी और अशिक्षा थी. 15 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने वर्णमाला का ज्ञान प्राप्त किया था. एक अध्यापक उनके गांव में आया. उसने वहां स्कूल चलाना शुरू किया. तब लिंकन ने पढ़ना सीखा. वैसे उन्होंने कभी विधिवत पढ़ाई नहीं की.

1847 में उन्होंने संसद के चुनाव लड़ने के लिए एक फार्म भरा तो उसमें एक सवाल पूछा गया था कि आपकी शिक्षा क्या रही है- उन्होंने एक शब्द में जवाब दिया-दोषपूर्ण. हां पढ़ सकने की क्षमता ने उनके सामने ऐसी नई और जादुई दुनिया खोल दी, जिसकी कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी.

मजदूरी से लेकर तमाम छोटे-मोटे काम किए

वह उधार से किताबें पढ़ने के लिए खेतों पर फावड़ा चलाते थे. अदालत में वकीलों की बहस सुनने के लिए 15-20 मील पैदल चलकर जाया करते थे. उन्होंने न जाने कितने ही छोटे-मोटे काम किए. मजदूरों और किसानों के बीच जब उन्हें बोलने का मौका मिलने लगा तो उनकी महत्वाकांक्षा जगने लगी. पता चल गया कि उनमें अपनी बातों से दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता है.

उनकी पत्नी राष्ट्रपति भवन का सामान उठा ले गईं

अजीब विरोधाभास है कि लिंकन को बाद के बरसों में जितना सराहा गया और सम्मान मिला, उनकी पत्नी को उतनी ही बदनामी. उनके निधन के बाद उन्होंने अपने लिए ज्यादा पैसे की मांग की. बीमारी के नाम पर फर्जी बिल देकर कांग्रेस से पैसे की मांग की.

यही नहीं बाद में उन्होंने ये भी कहा कि वह कर्जों में डूब गई हैं, लिहाजा ये अमरिका सरकार की ड्यूटी बनती है कि वो उनको इससे उबारे और उन्हें जीवन गुजारने के लिए पैसा दे. वह राष्ट्रपति भवन से जाते समय वहां से कई कीमती सामान भी उठा ले गईं. मैरी को राष्ट्रपतियों की सबसे लालची और खुदगर्ज पत्नी के रूप में याद किया गया

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