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Delhi दिल्ली: दूसरे विश्व युद्ध के बाद कुछ अपवादों को छोड़ दें तो दुनिया ने सभ्य होने की तरफ लगातार कदम बढ़ाए, लेकिन इक्कीसवीं सदी का चौथाई हिस्सा बीतने के बाद लग रहा है कि एक बार फिर दुनिया आधुनिकता की चादर लपेटे मध्य युगीन बर्बरता की ओर बढ़ रही है।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद ऐसी सोच वैश्विक स्तर पर बढ़ी है। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह मुसावी खोमैनी समेत कई सैन्य अधिकारियों की मौत ने दुनिया को एक बार फिर हिलाकर रख दिया है। दुनिया के कमजोर देश एक बार फिर आशंकित हो उठे हैं। उन्हें यह डर सताने लगा है कि अमेरिका के खिलाफ अगर उन्होंने नीतियां अपनाईं, तो हो सकता है कि अमेरिका अपने तरीके से योजना बनाकर उस पर हमला कर दे।
अमेरिका ने ईरान पर हमले के लिए जिन कारणों को गिनाया है, उनमें सबसे प्रमुख कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना, ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करना और वहां की मौजूदा शासन व्यवस्था को बदलना है। अमेरिका ने तर्क दिया है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के करीब था, जो दुनिया और क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए एक "अस्वीकार्य सुरक्षा खतरा" है। ट्रंप का कहना है कि ईरान ने अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को त्यागने के हर अवसर को ठुकरा दिया था।
ईरान पर हमले के बाद यह भी हो सकता है कि आतंकी घटनाएं बढ़ें। इससे दुनिया की चिंताएं बढ़ना अस्वाभाविक नहीं है। अमेरिका दावा करता है कि वह लोकतांत्रिक देश है। वह पूरी दुनिया में अपनी तरह लोकतंत्र स्थापित करने का दावा करता है। लेकिन जहां भी वह कार्रवाई करता है, वहां लोकतंत्र आते हुए नहीं दिखता। ट्रंप के दौर में ऐसी कार्रवाइयों से विश्व आर्डर गड़बड़ा गया है।
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