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Kathmandu काठमांडू। नेपाल में कूटनीतिक हलचल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार के उस निर्णय पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत 11 देशों में तैनात नेपाली राजदूतों को वापस बुलाने का आदेश दिया गया था। अदालत ने कहा है कि सरकार का यह कदम बिना पर्याप्त कारण और प्रक्रिया के लिया गया प्रतीत होता है, इसलिए इस पर न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।
दरअसल, नेपाल सरकार ने हाल ही में 11 देशों में नियुक्त अपने राजदूतों को तत्काल प्रभाव से वापस बुलाने का फैसला किया था। सरकार का कहना था कि यह कदम “कूटनीतिक पुनर्गठन” और “नई विदेश नीति प्राथमिकताओं” के तहत उठाया गया है। हालांकि, विपक्षी दलों और कई पूर्व राजनयिकों ने इस कदम को राजनीतिक प्रतिशोध बताया और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राजदूतों की नियुक्ति संवैधानिक प्रक्रिया और राष्ट्रपति की स्वीकृति से की गई थी, इसलिए उन्हें बिना उचित कारण और प्रक्रिया के वापस नहीं बुलाया जा सकता। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस फैसले का पूरा विवरण और कानूनी औचित्य प्रस्तुत करने को कहा है।
कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में यह भी कहा कि जब तक मामले की विस्तृत सुनवाई नहीं होती, तब तक सरकार किसी भी राजदूत को उसके पद से हटाने या नए राजदूतों की नियुक्ति करने से परहेज़ करे। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी नेपाल में सत्ता और नौकरशाही के बीच खींचतान का नया अध्याय मानी जा रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मामला नेपाल की विदेश नीति और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की परीक्षा है। अगर अदालत सरकार के फैसले को असंवैधानिक ठहराती है, तो यह प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई अगले हफ्ते निर्धारित की है। तब तक नेपाल के 11 राजदूत अपने पदों पर बने रहेंगे और विदेश मंत्रालय को इस पर कोई भी कार्रवाई करने से रोका गया है।
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