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रूस और तालिबान की बढ़ती दोस्ती का राज खुला पाकिस्तान की चिंता बढ़ी

Ratna Netam
4 Oct 2026 3:16 PM IST
रूस और तालिबान की बढ़ती दोस्ती का राज खुला  पाकिस्तान की चिंता बढ़ी
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नई दिल्ली। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद दक्षिण एशिया की भू-राजनीति लगातार बदल रही है। अब रूस और तालिबान के बीच बढ़ती नजदीकी ने इस पूरे समीकरण को और महत्वपूर्ण बना दिया है। मई 2026 में रूस और तालिबान प्रशासन के बीच सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसके बाद मॉस्को ने काबुल के साथ अपने रिश्तों को केवल राजनयिक संपर्क तक सीमित रखने के बजाय सुरक्षा और रक्षा सहयोग की दिशा में आगे बढ़ाने के संकेत दिए हैं। इस घटनाक्रम को पाकिस्तान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस्लामाबाद और काबुल के संबंध हाल के महीनों में बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं।
रूस और तालिबान के बीच हुए समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि भारतीय और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों के मुताबिक इसमें सैन्य तकनीक, हथियारों से जुड़े सहयोग, रूस में बने पुराने हथियारों और सैन्य उपकरणों की मरम्मत, तकनीकी सहायता तथा संभावित प्रशिक्षण जैसे क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। भारतीय काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स ने भी इसे रूस-काबुल संबंधों में एक अहम बदलाव के रूप में बताया है। संगठन के मुताबिक समझौता 27 मई 2026 को मॉस्को में हुआ था और इसके पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग तथा अफगानिस्तान में अमेरिकी मौजूदगी खत्म होने के बाद बने भू-राजनीतिक खालीपन जैसे कई कारण हैं।
रूस ने तालिबान से दोस्ती क्यों बढ़ाई?
रूस की तालिबान नीति पिछले कुछ वर्षों में काफी बदली है। कभी रूस तालिबान को प्रतिबंधित आतंकी संगठन मानता था, लेकिन अप्रैल 2025 में उसने तालिबान को अपनी प्रतिबंधित संगठनों की सूची से हटा दिया। इसके बाद जुलाई 2025 में रूस तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाला पहला देश बना। 2026 में मॉस्को ने इस रिश्ते को आगे बढ़ाते हुए अफगानिस्तान के साथ एक व्यापक साझेदारी की बात कही। रूसी सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु ने क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिहाज से काबुल के साथ संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया था।रूस के लिए अफगानिस्तान केवल दक्षिण एशिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि मध्य एशिया की सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ क्षेत्र है। अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट खुरासान जैसे आतंकी संगठनों की गतिविधियों को लेकर मॉस्को को लंबे समय से चिंता रही है। ऐसे में तालिबान के साथ सुरक्षा सहयोग रूस को अफगान क्षेत्र में मौजूद आतंकी खतरों की निगरानी और उनसे निपटने के लिए एक नया चैनल देता है।
पाकिस्तान के लिए मामला क्यों अहम?
पाकिस्तान और अफगान तालिबान के रिश्ते कभी काफी करीबी माने जाते थे, लेकिन अब दोनों देशों के संबंधों में भारी गिरावट आई है। इस्लामाबाद लगातार आरोप लगाता रहा है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान में हमले करने वाले आतंकवादी समूहों के लिए हो रहा है। विशेष रूप से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद बढ़ा है। तालिबान पाकिस्तान के इन आरोपों से इनकार करता है और इसे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा समस्या बताता है।सितंबर और अक्टूबर 2026 में दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ा। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के कुछ इलाकों में हवाई हमले किए। तालिबान प्रशासन ने इन हमलों में नागरिकों के मारे जाने का आरोप लगाया, जबकि पाकिस्तान ने अपने अभियान को आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने की कार्रवाई बताया। 1 अक्टूबर 2026 के हमलों को लेकर संयुक्त राष्ट्र की सहायता मिशन ने भी कम से कम 10 नागरिकों की मौत की जानकारी दी, जबकि पाकिस्तान ने अपने ऑपरेशन में आतंकवादियों को निशाना बनाने का दावा किया।ऐसे समय में रूस का तालिबान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। कुछ विश्लेषणों में इस समझौते को पाकिस्तान पर संभावित दबाव के नए तत्व के तौर पर देखा गया है, खासकर तब जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पार हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाई को लेकर तनाव बढ़ रहा है।
क्या रूस सीधे पाकिस्तान के खिलाफ खड़ा हो गया?
यहां सावधानी जरूरी है। अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि रूस ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन बनाया है। रूस और पाकिस्तान के बीच भी सुरक्षा और आतंकवाद निरोधक संवाद जारी है। जून 2026 में दोनों देशों के बीच आतंकवाद विरोधी संयुक्त कार्य समूह की बैठक इस्लामाबाद में हुई थी, जिसमें अफगानिस्तान से पैदा होने वाले आतंकी खतरे पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने आतंकवाद विरोधी सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी।इसलिए तस्वीर सीधी तरह से ‘रूस बनाम पाकिस्तान’ वाली नहीं है। मॉस्को एक तरफ इस्लामाबाद के साथ आतंकवाद विरोधी बातचीत बनाए हुए है और दूसरी तरफ काबुल के साथ अपने रिश्तों को भी तेजी से गहरा कर रहा है। इसका मतलब यह है कि रूस दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में अपने हितों के अनुसार कई पक्षों के साथ समानांतर संबंध कायम रख रहा है।
तालिबान को क्या फायदा होगा?
तालिबान के लिए रूस के साथ बढ़ते रिश्ते कई कारणों से अहम हैं। सबसे बड़ा फायदा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक स्वीकार्यता और व्यावहारिक सहयोग का है। रूस पहले ही तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता दे चुका है। इसके अलावा सैन्य-तकनीकी सहयोग अफगान सुरक्षा बलों के पास मौजूद रूसी और सोवियत दौर के उपकरणों को चालू रखने तथा उनकी मरम्मत में मदद कर सकता है। कुछ रिपोर्टों में भविष्य के संभावित हथियार और तकनीकी सहयोग की चर्चा हुई है, लेकिन समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं होने के कारण इन सभी पहलुओं को अंतिम तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता।तालिबान के लिए यह सहयोग पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अतिरिक्त रणनीतिक विकल्प भी पैदा करता है। हालांकि इसे पाकिस्तान को सैन्य रूप से चुनौती देने की क्षमता के बराबर मानना अभी जल्दबाजी होगी।
भारत के लिए क्या मायने हैं?
भारत लंबे समय से अफगानिस्तान के घटनाक्रम को अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के नजरिए से देखता रहा है। रूस और तालिबान के बीच बातचीत बढ़ने से नई दिल्ली के लिए भी क्षेत्रीय समीकरणों को समझने का एक नया आयाम जुड़ता है। भारत और रूस के बीच लंबे समय से रणनीतिक संबंध हैं और भारत रूस के अफगानिस्तान से जुड़े संवाद को करीब से देखता रहा है।हालांकि भारत का अफगानिस्तान को लेकर दृष्टिकोण अपनी सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी नीति और क्षेत्रीय हितों पर आधारित है। रूस-तालिबान संबंधों में बढ़ोतरी को सीधे भारत के पक्ष में किसी गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। बल्कि यह बदलते एशियाई शक्ति-संतुलन का हिस्सा है।
आगे क्या हो सकता है?
मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि अफगानिस्तान धीरे-धीरे अलग-अलग क्षेत्रीय शक्तियों के साथ व्यावहारिक संबंधों का विस्तार कर रहा है। रूस तालिबान के साथ सुरक्षा और आर्थिक संपर्क बढ़ा रहा है, जबकि पाकिस्तान के साथ काबुल के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। यूरोपीय संघ की अक्टूबर 2026 की क्षेत्रीय समीक्षा भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों में लगातार अस्थिरता की ओर इशारा करती है।ऐसे में रूस-तालिबान सैन्य-तकनीकी सहयोग को पाकिस्तान के लिए तत्काल सैन्य खतरे की बजाय बदलते रणनीतिक समीकरण के संकेत के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। असली महत्व इस बात का होगा कि आने वाले महीनों में समझौते के तहत वास्तविक सहयोग कितना आगे बढ़ता है, रूस तालिबान को किस स्तर की तकनीकी या सैन्य सहायता देता है और पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव किस दिशा में जाता है। फिलहाल इतना जरूर है कि मॉस्को और काबुल की बढ़ती नजदीकी ने क्षेत्रीय कूटनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है और पाकिस्तान को अपने पश्चिमी मोर्चे पर बदलते समीकरणों को ध्यान से देखना पड़ रहा है।
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