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Delhi दिल्ली। "मैं देख रहा हूं कि स्वतंत्रता का दिन निकट है, जब यह देश अपनी बेड़ियां तोड़ देगा।" मिगुएल हिडाल्गो वाई कोस्टिला के यह कथन उस संघर्ष की भावना को दर्शाता है, जिसने 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में मैक्सिको को आंदोलित कर दिया था। लगभग तीन शताब्दियों तक स्पेन के औपनिवेशिक शासन में रहने के बाद मैक्सिको की जनता में स्वतंत्रता की इच्छा प्रबल होती जा रही थी। 1810 में हिडाल्गो द्वारा दिया गया “ग्रितो दे डोलोरेस” विद्रोह की चिंगारी बना, जिसने पूरे देश में आंदोलन की लहर पैदा की।
हिडाल्गो के बलिदान के बाद भी संघर्ष थमा नहीं। जोस मारिया मोरेलोस ने आंदोलन को वैचारिक और संगठनात्मक आधार प्रदान किया। उन्होंने सामाजिक समानता और राष्ट्रीय संप्रभुता की मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखा। वर्षों तक चले संघर्ष, असफलताओं और दमन के बावजूद स्वतंत्रता का विचार जनमानस में गहराई से स्थापित हो चुका था।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 24 फरवरी 1821 को मेक्सिकन सैन्य अधिकारी अगस्टिन डी इतुर्बिडे ने इगुआला नगर में “इगुआला योजना” (प्लान ऑफ इगुआला) का ऐलान किया। यह दस्तावेज स्वतंत्रता आंदोलन के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ। योजना तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित थी—रोमन कैथोलिक धर्म की आधिकारिक मान्यता, स्पेन से पूर्ण स्वतंत्रता, और देश के सभी वर्गों के बीच एकता और समान अधिकार। इन सिद्धांतों को “तीन गारंटी” के रूप में जाना गया।
इगुआला योजना ने स्वतंत्रता संग्राम को अंतिम चरण में पहुंचा दिया। इसी के आधार पर अगस्त 1821 में कॉर्डोबा की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिससे मैक्सिको की स्वतंत्रता को औपचारिक स्वीकृति मिली। 27 सितंबर 1821 को स्वतंत्रता सेनानियों का मेक्सिको सिटी में प्रवेश स्पेनिश शासन के अंत का प्रतीक बना। इसके बाद इटुर्बिदे को सम्राट घोषित किया गया और मैक्सिको ने संवैधानिक राजतंत्र के रूप में अपने नए युग की शुरुआत की, हालांकि यह व्यवस्था लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकी।
इगुआला योजना केवल एक राजनीतिक समझौता नहीं थी, बल्कि यह उस राष्ट्रीय चेतना का परिणाम थी जो वर्षों के संघर्ष और बलिदान से विकसित हुई थी। यह दस्तावेज मैक्सिको के इतिहास में स्वतंत्रता, आस्था और एकता का प्रतीक था।
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