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नए राष्ट्रपति के सामने आई बड़ी चुनौती सड़कों पर उतरी जनता का विरोध शांत कैसे करे

Teja
16 July 2022 9:53 AM GMT
नए राष्ट्रपति के सामने आई बड़ी चुनौती सड़कों पर उतरी जनता का विरोध शांत कैसे करे
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जनता से रिश्ता वेब डेस्क। देश छोड़ कर भाग चुके गोटाबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति पद से इस्तीफे के बाद श्रीलंका में किसे राष्ट्रपति चुना जाएगा, यह सबसे बड़ा सवाल है. 1978 के बाद यह पहला मौका है जब श्रीलंका के सांसद वहां के राष्ट्रपति का चुनाव करेंगे. राष्ट्रपति पद की दौड़ में तीन नाम उभर कर आ रहे हैं. पूर्व कैबिनेट मंत्री दुलास अल्हाप्परुमा इस पद के लिए अपनी दावेदारी घोषित कर चुके हैं और उन्होंने कहा कि वह चुनाव के लिए पर्चा भरेंगे. विपक्षी दल न्यू डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता सजित प्रेमदासा भी इस रेस में शामिल हैं. लेकिन तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण नाम कार्यवाहक राष्ट्रपति और यूनाइटेड नेशनल पार्टी के रानिल विक्रमसिंघे का है.

नए राष्ट्रपति के सामने बड़ी चुनौती
श्रीलंका में 20 जुलाई को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं. ऐसे में राजनीतिक परिवार से आने वाले विक्रमसिंघे वरिष्ठ नेता हैं और चार बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री का पद संभाल चुके हैं. लेकिन राजपक्षे सरकार की खराब और गैर जिम्मेदारियों में उनकी भी भागीदारी मानी जाती है. इसलिए जनता उनसे खुश नहीं है और यह बात उनके खिलाफ जाती है. जबकि दुलास अलाहप्पेरुमा और सजित प्रेमदासा के पास राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा अनुभव नहीं है. साथ ही यह भी साफ नहीं है कि क्या ये दोनों नेता श्रीलंका में बनने जा रही सर्वदलीय सरकार का नेतृत्व कर पाने में सक्षम होंगे. वह भी ऐसे दौर में जबकि देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है और सबसे पहली जरूरत अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के साथ लोगों की माली हालत ठीक करने की है.
नए राष्ट्रपति के सामने एक और बड़ी समस्या यह होगी कि कैसे सड़कों पर उतरी जनता का विरोध शांत करे. जनता का सारे राजनीतिक दलों से विश्वास उठ चुका है और लोग मांग कर रहे हैं कि सर्वदलीय सरकार बनाने के बजाय एक साल के लिए अंतरिम सरकार बनाई जाए. साथ ही एक पीपुल्स काउंसिल बने, जिसकी देखरेख में किसी राजनीतिक दल को सत्ता हस्तांतरण का काम किया जाए. श्रीलंका की जनता संविधान में भी बदलाव की मांग कर रही है. वह ऐसा संविधान चाहती है, जिसमें जनता के लिए ज्यादा अधिकार हों. नए राष्ट्रपति और उनकी टीम के लिए यह चुनौतीपूर्ण दौर होगा कि किस तरह से जनता को शांत करते हुए उसके राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के सुझावों को अपनाया जाए.
जनता को कैसे करेंगे संतुष्ट
मौजूदा स्थिति में साफ है कि बगैर जनता और सिविल सोसायटी के समर्थन के नए राष्ट्रपति के लिए देश को आगे बढ़ाना संभव नहीं होगा. ऐसे में यह भी जरूरी होगा कि राजनीतिक दलों को भी संतुष्ट किया जाए. राजनीतिक दलों को भी अब अपनी नीतियां बदलनी होंगी और क्षेत्रीय तथा भाषाई सोच से ऊपर देश को रखना होगा. अस्थिरता और आर्थिक संकट से निपटने के लिए श्रीलंका को विदेशी सरकारों की भी मदद की जरूरत पड़ेगी. इन सब में संतुलन साधना नए राष्ट्रपति के लिए बिल्कुल आसान नहीं होगा.



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