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सिंधु जल समझौते पर बढ़ा तनाव, भारत की जल सुरक्षा को लेकर बड़ी बहस
Ratna Netam
30 Oct 2026 5:46 PM IST

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नई दिल्ली : 30 अक्टूबर 2026। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर जारी विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते पर कोई भी निर्णय लेते समय भारत के राष्ट्रीय हितों, जल सुरक्षा, ऊर्जा आवश्यकताओं और सीमापार आतंकवाद से जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पीस स्टडीज के शोधकर्ता डॉ. मोहम्मद उस्मान भट्टी ने अपने हालिया विश्लेषण में कहा है कि सिंधु जल संधि का भविष्य केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, पर्यावरण और दोनों देशों के रणनीतिक हितों से भी है।दरअसल, भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया था। इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। भारत सरकार ने पाकिस्तान पर सीमापार आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाते हुए स्पष्ट किया था कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना विश्वसनीय और स्थायी रूप से बंद नहीं करता, तब तक संधि को स्थगित रखने का उसका निर्णय जारी रहेगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने जुलाई 2026 में भी अपना रुख दोहराया था। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि सिंधु जल संधि पर भारत की स्थिति स्पष्ट और अपरिवर्तित है। उन्होंने पाकिस्तान से सीमापार आतंकवाद को समर्थन समाप्त करने की मांग की थी। वहीं पाकिस्तान ने भारत के फैसले को अस्वीकार करते हुए कहा है कि किसी भी देश को एकतरफा तरीके से संधि के दायित्व समाप्त करने का अधिकार नहीं है।सिंधु जल संधि पर ताजा बहस के बीच 28 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अपने विश्लेषण में डॉ. मोहम्मद उस्मान भट्टी ने कहा कि दोनों देशों के सामने अब केवल पुरानी संधि को जारी रखने या पूरी तरह समाप्त करने का विकल्प नहीं है। उनके अनुसार, बदलती परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे समाधान की आवश्यकता है, जिसमें भारत के राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें और जल संसाधनों के प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
विश्लेषक ने कहा कि भारत को अपनी जलविद्युत परियोजनाओं, सिंचाई व्यवस्था और जल संसाधनों के वैध उपयोग को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही जल संबंधी आंकड़ों के संग्रह, बाढ़ प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन भी आवश्यक है।सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इस समझौते पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल उपयोग की व्यवस्था निर्धारित की गई थी।
समझौते के अनुसार, रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल पर मुख्य अधिकार भारत को दिए गए, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि, पश्चिमी नदियों पर भी भारत को संधि की शर्तों के अनुसार कुछ सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाएं संचालित करने की अनुमति है।पिछले कई दशकों में दोनों देशों के बीच इन नदियों पर बनने वाली जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर विवाद होते रहे हैं। बगलिहार, किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाएं इस विवाद के प्रमुख उदाहरण हैं। पाकिस्तान ने समय-समय पर इन परियोजनाओं की डिजाइन और संचालन पर सवाल उठाए हैं, जबकि भारत ने अपने अधिकारों के तहत इनके निर्माण का पक्ष रखा है।
इस विवाद ने अगस्त 2026 में नया मोड़ लिया, जब हेग स्थित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने सिंधु जल संधि की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। 31 अगस्त को जारी निर्णय में न्यायाधिकरण ने कहा कि भारत द्वारा संधि को स्थगित रखने का निर्णय उसके कानूनी दायित्वों को समाप्त नहीं करता। न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि समझौता लागू है और भारत को इसके प्रावधानों का पालन करना चाहिए।इसके अतिरिक्त न्यायाधिकरण ने रतले जलविद्युत परियोजना के निर्माण से संबंधित कुछ गतिविधियों पर अंतरिम प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया। यह व्यवस्था एक तटस्थ विशेषज्ञ के निर्णय से जुड़ी हुई है, जिसके जुलाई 2027 में आने की संभावना बताई गई है।
हालांकि, भारत सरकार ने इस निर्णय को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। भारत का कहना है कि संबंधित मध्यस्थता न्यायाधिकरण को इस मामले में निर्णय देने का अधिकार नहीं है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत संधि को स्थगित रखने के अपने फैसले पर कायम है। इस प्रकार कानूनी अधिकार क्षेत्र और संधि के वर्तमान स्वरूप को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।विश्लेषकों के अनुसार, सिंधु जल संधि पर विवाद के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। दूसरा भारत और पाकिस्तान की बढ़ती जल आवश्यकताओं का है। तीसरा जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों, वर्षा और नदी प्रवाह में संभावित बदलावों से संबंधित है।
भारत में जम्मू-कश्मीर और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में जलविद्युत उत्पादन की व्यापक संभावनाएं हैं। जलविद्युत परियोजनाओं के विस्तार से बिजली उत्पादन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, इन परियोजनाओं के निर्माण में पर्यावरण संरक्षण और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से संबंधित चिंताओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।दूसरी ओर, पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर करती है। ऐसे में जल प्रवाह को लेकर अनिश्चितता उसकी सिंचाई व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों के लिए चिंता का विषय है। पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल संधि का पालन दोनों देशों के हित में आवश्यक है।
डॉ. भट्टी ने अपने विश्लेषण में सुझाव दिया कि भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर स्पष्ट रुख रखते हुए संधि के आधुनिकीकरण के लिए बातचीत की संभावनाएं भी खुली रखनी चाहिए। उनके अनुसार, भविष्य की किसी व्यवस्था में जलवायु परिवर्तन, तकनीकी विकास, बाढ़ प्रबंधन और आधुनिक जल आवश्यकताओं से संबंधित प्रावधानों पर विचार होना चाहिए।इस विषय पर 19 अक्टूबर को प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में शोधकर्ता डॉ. अंकिता बोरठाकुर ने भी संधि की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता बताई थी। उन्होंने जल सुरक्षा, ऊर्जा आवश्यकताओं और जम्मू-कश्मीर की विकास संबंधी जरूरतों को महत्वपूर्ण माना। अध्ययन में आवश्यक मानवीय सूचना आदान-प्रदान जारी रखने पर भी जोर दिया गया।फिलहाल सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई नया आपसी समझौता सामने नहीं आया है। भारत अपने सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण पर कायम है, जबकि पाकिस्तान संधि के निरंतर लागू रहने का पक्ष रख रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का दीर्घकालिक समाधान जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन, कानूनी स्पष्टता और पारस्परिक संवाद से जुड़ा होगा। आने वाले समय में दोनों देशों की नीतियां न केवल उनके द्विपक्षीय संबंधों, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की जल और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।
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