
वर्ल्ड | अंतरिक्ष से लौटने के बाद क्या बदलेगा?
नासा की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और उनके साथी बुच विलमोर की सेहत पर 45 दिनों तक बारीकी से नजर रखी जाएगी। 6 महीने तक स्पेस में रहने के बाद, शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना बेहद जरूरी है।
क्यों जरूरी है यह निगरानी?
अंतरिक्ष में लंबा समय बिताने से शरीर पर कई दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं, जिनका अध्ययन भविष्य के मंगल और चंद्र अभियानों के लिए अहम होगा। वैज्ञानिक देखेंगे कि माइक्रोग्रैविटी और अन्य अंतरिक्षीय प्रभावों से शरीर कितना प्रभावित होता है।
मुख्य 6 चुनौतियां जो सुनीता और बुच को झेलनी होंगी
हड्डियों और मांसपेशियों में कमजोरी
अंतरिक्ष में भारहीनता के कारण हड्डियां और मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। धरती पर लौटने के बाद उन्हें पुनः मजबूत बनाने के लिए विशेष व्यायाम और उपचार की जरूरत होगी।
दिल और रक्त प्रवाह पर असर
स्पेस में दिल को कम मेहनत करनी पड़ती है, जिससे उसकी कार्यक्षमता घट सकती है। वापस आकर ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन को सामान्य करना चुनौती होगी।
संतुलन और मोटर स्किल्स में गिरावट
माइक्रोग्रैविटी के कारण शरीर संतुलन और गति नियंत्रण की क्षमता खो देता है। पुनः सामान्य होने में हफ्तों लग सकते हैं।
दृष्टि संबंधी समस्याएं
स्पेसफ्लाइट के दौरान फ्लूइड शिफ्ट होने से आंखों की रोशनी प्रभावित हो सकती है। यह एक दीर्घकालिक समस्या बन सकती है।
इम्यून सिस्टम में बदलाव
अंतरिक्ष में रहने से इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है, जिससे शरीर संक्रमण के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
मानसिक और भावनात्मक प्रभाव
लंबे समय तक अलग-थलग रहने से तनाव और अवसाद की संभावना बढ़ जाती है। पृथ्वी पर लौटने के बाद मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित रखना जरूरी होगा।
नासा का अध्ययन क्यों खास है?
इस अध्ययन से वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए मानव शरीर को कैसे तैयार किया जाए। चंद्रमा और मंगल मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत बनाए रखना बेहद जरूरी होगा।
क्या अगला मिशन आसान होगा?
सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर के अनुभव और नासा की यह रिसर्च भविष्य के मिशनों के लिए मील का पत्थर साबित होगी। अब सवाल यह है कि क्या इंसान अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के लिए खुद को पूरी तरह ढाल सकता है?





