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रूस तेल खरीद पर भारत को राहत के संकेत

Kavita2
15 July 2026 10:15 AM IST
रूस तेल खरीद पर भारत को राहत के संकेत
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वाशिंगटन : अमेरिका ने रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों से जुड़े अपने प्रस्तावित बिल में बदलाव किया है, जिससे भारत और चीन जैसे देशों को राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है। दोनों देश रूस से कच्चे तेल के दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में शामिल हैं। नए प्रस्ताव में पहले की तुलना में टैरिफ व्यवस्था को नरम किया गया है, जिससे रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित आर्थिक दबाव कम हो सकता है।

अमेरिका के संशोधित प्रस्ताव में पहले के मुकाबले टैरिफ को कम करने का प्रावधान किया गया है। इससे उन देशों पर लगने वाले संभावित अतिरिक्त शुल्क का असर कम हो जाएगा, जो रूस से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदते हैं। हालांकि, बिल का मुख्य उद्देश्य अभी भी रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसके राजस्व स्रोतों को सीमित करना है।

अमेरिका द्वारा प्रस्तावित कानून का लक्ष्य रूस के अधिकारियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाना है। इसके साथ ही टैरिफ जैसे उपायों के जरिए उन देशों को रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने के लिए प्रोत्साहित करना है, जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहे हैं।

भारत और चीन रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की ओर से रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों ने रूस से ऊर्जा आयात जारी रखा है। रूस से मिलने वाले कच्चे तेल की कीमत और उपलब्धता के कारण भारत और चीन ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूसी बाजार पर निर्भरता बढ़ाई है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से रूस की ऊर्जा आय से जुड़े मुद्दों को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उनका मानना है कि तेल और गैस से मिलने वाला राजस्व रूस की अर्थव्यवस्था और सैन्य गतिविधियों को समर्थन देता है। इसी वजह से पश्चिमी देश रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के लिए विभिन्न कदम उठा रहे हैं।

हालांकि, भारत ने लगातार कहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद नीतियां देश की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा जरूरतों पर आधारित हैं। भारत का कहना है कि बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए किफायती ऊर्जा स्रोतों की जरूरत है। ऐसे में तेल आयात के फैसले वैश्विक बाजार की परिस्थितियों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।

नए प्रस्तावित टैरिफ बदलाव को भारत और चीन के लिए सकारात्मक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पहले के प्रस्ताव में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अधिक कठोर शुल्क लगाने की बात कही गई थी, जिससे दोनों देशों के व्यापार और ऊर्जा लागत पर असर पड़ने की आशंका थी। संशोधित प्रस्ताव में इस प्रावधान को काफी नरम किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका का नया प्रस्ताव लागू होता है तो इसका असर रूस के ऊर्जा कारोबार पर तो पड़ेगा, लेकिन भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों पर दबाव पहले की तुलना में कम हो सकता है। इससे वैश्विक तेल बाजार में भी स्थिरता बनी रहने की संभावना है।

भारत के लिए कच्चे तेल का आयात बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। रूस से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। कम कीमत पर तेल मिलने से देश की अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

दूसरी ओर, चीन भी रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पाद खरीदता है। चीन की विशाल औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की लगातार आपूर्ति जरूरी है। इसलिए रूसी तेल पर किसी भी तरह के अतिरिक्त प्रतिबंध का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

अमेरिकी प्रस्ताव में बदलाव ऐसे समय में आया है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। पश्चिमी देश रूस पर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, जबकि कई विकासशील देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि, संशोधित बिल अभी अंतिम रूप से कानून नहीं बना है। इसे अमेरिकी संसद की प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसमें आगे भी बदलाव संभव हैं। इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं है कि अंतिम रूप में टैरिफ और प्रतिबंधों से जुड़े प्रावधान किस तरह लागू किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम वैश्विक ऊर्जा व्यापार और रूस के साथ आर्थिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। लेकिन भारत और चीन जैसे देशों को राहत देने वाला नरम रुख यह संकेत देता है कि अमेरिका भी वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलावों के संभावित प्रभावों को ध्यान में रख रहा है।

फिलहाल संशोधित रूस प्रतिबंध बिल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो इसका असर रूस की अर्थव्यवस्था, वैश्विक तेल बाजार और भारत-चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की नीतियों पर पड़ सकता है।

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