विश्व
बदलता वैश्विक ढांचा: अमेरिकी मीडिया ने BRICS को माना बड़ा मोड़
Tara Tandi
12 Sept 2026 4:27 PM IST

x
वॉशिंगटन: अमेरिका के बड़े अख़बारों ने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) समिट को बदलते ग्लोबल ऑर्डर की झलक के तौर पर देखा है। यह ऑर्डर तनावपूर्ण गठबंधनों, क्षेत्रीय युद्धों और वॉशिंगटन व बीजिंग के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से आकार ले रहा है।
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने एक रिपोर्ट में कहा कि समिट के दौरान सबसे अहम सवाल यह था कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग विकासशील दुनिया की ज़्यादा प्रभावशाली आवाज़ बनकर उभरेंगे।
चीन ब्रिक्स को अमेरिकी ताकत को चुनौती देने के एक ज़रिया के तौर पर देखता है। वहीं, भारत चाहता है कि यह ग्रुप इतना व्यापक बना रहे कि देशों को प्रतिस्पर्धी गुटों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न होना पड़े।
अख़बार ने कहा कि युद्ध, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, अमेरिकी टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर चिंताएं देशों को वॉशिंगटन और बीजिंग के साथ अपने रिश्तों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर रही हैं।
वॉशिंगटन में स्टिमसन सेंटर के चाइना प्रोग्राम की डायरेक्टर युन सन ने 'टाइम्स' को बताया, "चीन की भारत को लेकर मुख्य चिंता हमेशा से भारत का अमेरिका के साथ झुकाव रही है। इसलिए बीजिंग निश्चित रूप से दिल्ली के साथ फिर से संबंध बेहतर करने का मौका नहीं गंवाना चाहेगा।"
शी का यह दौरा सात साल में भारत का उनका पहला दौरा है। यह दौरा 2020 में सीमा पर हुई जानलेवा झड़प के बाद रिश्तों में आई लंबी गिरावट और 2024 में शुरू हुई सावधानी भरी कूटनीतिक सुधार की प्रक्रिया के बाद हो रहा है।
शी की 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात होनी है। इस मुलाकात से नई दिल्ली समिट का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि चीनी नेता अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ अहम बातचीत की तैयारी कर रहे हैं।
'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने कहा कि अमेरिका के साथ भारत और चीन के रिश्तों में अनिश्चितता ने इन दोनों परमाणु-सक्षम पड़ोसी देशों के लिए तनाव कम करने की गुंजाइश पैदा की है।
नई दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में चाइनीज़ स्टडीज़ के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने 'जर्नल' को बताया, "भारत फिर से तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा है।"
अख़बार ने कहा कि भारत-चीन रिश्तों में कोई भी सुधार सीमा विवाद के अनसुलझे रहने, पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी रिश्तों और हिंद महासागर में सुरक्षा प्रतिस्पर्धा की वजह से सीमित है।
सन ने 'जर्नल' को बताया, "चीनी पक्ष भी देख रहा है कि भारत सही समय का इंतज़ार कर रहा है और बस बेहतर विकल्पों पर काम कर रहा है जो भविष्य में सामने आ सकते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि इससे चीन-भारत रिश्तों में मौजूदा सुधार की ऊपरी प्रकृति और बढ़ जाती है।"
'द वॉशिंगटन पोस्ट' ने ऐसी रिपोर्टें छापीं जिनमें समिट को भारत के लिए एक मुश्किल संतुलन बनाने की कवायद बताया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मीटिंग में शामिल होने वाले नेताओं में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन और शी जिनपिंग शामिल थे। समिट से पहले पीएम मोदी ने पुतिन और पेज़ेशकियन के साथ अलग-अलग बातचीत की।
'पोस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, इस बढ़े हुए ग्रुप के 11 सदस्य ग्लोबल ऑर्डर में ज़्यादा असर चाहते हैं, लेकिन उनके राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति से जुड़े हित अलग-अलग हैं।
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध इन मतभेदों को उजागर कर सकते हैं। भारत के रूस और ईरान के साथ लंबे समय से संबंध हैं, साथ ही वह अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी अपनी पार्टनरशिप बढ़ा रहा है।
Next Story





