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दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में खोजा ब्रह्मांड का रहस्य, न्यूट्रिनो पकड़ने वाले वैज्ञानिक फ्रांसिस हैल्जेन को नोबेल पुरस्कार
jantaserishta.com
6 Oct 2026 4:41 PM IST

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नई दिल्ली: बेल्जियम में जन्मे अमेरिकी वैज्ञानिक फ्रांसिस हैल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें यह सम्मान अंतरिक्ष से धरती तक पहुंचने वाले बेहद ऊर्जावान न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनके स्रोतों के बारे में जानकारी हासिल करने में महत्वपूर्ण योगदान के लिए मिला है। हैल्जेन ने दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में न्यूट्रिनो का पता लगाने वाली आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बनाने का विचार दिया था।
नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए बताई गई है।
1.5 से 2.5 किलोमीटर गहरी बर्फ में लगाए गए सेंसर
आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है। इसके सेंसर जमीन के ऊपर नहीं, बल्कि करीब 1.5 से 2.5 किलोमीटर गहरी बर्फ के अंदर लगाए गए हैं। इस पूरी व्यवस्था के पीछे उद्देश्य ऐसे बेहद छोटे कणों को पकड़ना है, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में पहचानना बहुत मुश्किल होता है।
न्यूट्रिनो बेहद छोटे कण हैं। ये सूरज, तारों और अंतरिक्ष में होने वाली बहुत शक्तिशाली घटनाओं से निकलते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर और पूरी धरती से होकर गुजरते हैं, लेकिन आम तौर पर इनका पता लगाना संभव नहीं होता।
इन कणों की एक खासियत यह है कि ये अंतरिक्ष से धरती तक लगभग सीधी दिशा में आते हैं और रास्ते में बहुत कम बदलाव होता है। ऐसे में अगर वैज्ञानिक इनका पता लगा लें, तो वे यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि ये ब्रह्मांड के किस हिस्से और किस घटना से निकले हैं।
बर्फ में टक्कर से पैदा होती है हल्की रोशनी
न्यूट्रिनो को पकड़ना इसलिए कठिन है क्योंकि ये अधिकतर पदार्थों से बिना टकराए गुजर जाते हैं। इसी चुनौती को देखते हुए फ्रांसिस हैल्जेन ने 1988 में दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का इस्तेमाल करने का विचार सामने रखा।
इस योजना के तहत करीब एक घन किलोमीटर बर्फ के अंदर हजारों रोशनी पकड़ने वाले सेंसर लगाए गए। जब कोई न्यूट्रिनो बर्फ में मौजूद परमाणु के नाभिक से टकराता है, तो उस टक्कर के दौरान बहुत हल्की रोशनी पैदा होती है। बर्फ में लगे सेंसर इसी रोशनी को दर्ज करते हैं। यही तरीका आगे चलकर आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी का आधार बना।
2011 में पूरा हुआ आइसक्यूब का निर्माण
आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी का निर्माण 2011 में पूरा हुआ। यहां दर्ज किए गए उच्च-ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो ने वैज्ञानिकों को सौरमंडल से बहुत दूर मौजूद स्रोतों और वहां होने वाली घटनाओं को समझने का एक नया माध्यम दिया।
पहले वैज्ञानिक ब्रह्मांड का अध्ययन मुख्य रूप से दिखाई देने वाली रोशनी, एक्स-रे और दूसरी तरह की किरणों के जरिए करते थे। न्यूट्रिनो ने इस अध्ययन में एक और रास्ता खोल दिया। अब वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि अंतरिक्ष से आने वाले न्यूट्रिनो किस दिशा से पहुंचे और उनके पीछे कौन-सी शक्तिशाली अंतरिक्षीय घटना हो सकती है।
2025 में क्वांटम खोज के लिए मिला था भौतिकी नोबेल
2025 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार से जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस को सम्मानित किया गया। पुरस्कार इलेक्ट्रिक सर्किट में क्वांटम दुनिया के नियमों से जुड़ी घटनाओं को देखने वाली खोजों के लिए दिया गया। इन वैज्ञानिकों के काम ने बड़े स्तर के इलेक्ट्रिक सर्किट में क्वांटम प्रभावों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वैज्ञानिकों ने दिखाया था कि क्वांटम दुनिया की घटनाएं केवल बेहद छोटी चीजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इलेक्ट्रिक सर्किट में भी देखी जा सकती हैं। इस खोज से क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी तकनीकों को समझने और आगे बढ़ाने में मदद मिली।
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