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शिमला। हिमालयी क्षेत्र के इतिहास, कला, पुरातत्व, संस्कृति और विरासत संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विमर्श के लिए शिमला में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हुआ है। हिमाचल प्रदेश राज्य संग्रहालय की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में भारत के विभिन्न हिमालयी राज्यों के साथ-साथ नेपाल, अफगानिस्तान और जर्मनी सहित विदेशों से आए विद्वान, शोधकर्ता और विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। सम्मेलन 6 से 8 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। इसका विषय “History, Art, Archaeology and Culture of the Himalaya: Continuity, Change and Preservation” रखा गया है।
सम्मेलन का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को समझने के साथ-साथ बदलते समय में उसके संरक्षण की चुनौतियों पर अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों के बीच संवाद स्थापित करना है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्यों के शोधकर्ताओं के अलावा नेपाल तथा अन्य देशों से आए विद्वान भी अपने अध्ययन और शोध प्रस्तुत कर रहे हैं।
मंगलवार को सम्मेलन से जुड़े प्रतिभागियों और आयोजकों ने कहा कि यह आयोजन उन विषयों को एक साझा मंच पर लाता है, जिन पर अक्सर अलग-अलग शैक्षणिक क्षेत्रों में काम किया जाता है। इतिहास, मानवविज्ञान, पुरातत्व, कला, वास्तुकला, लोक संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और विरासत संरक्षण से जुड़े शोधकर्ता यहां एक-दूसरे के निष्कर्षों और अनुभवों को साझा कर रहे हैं।
जर्मनी के मानवविज्ञानी विटोर दा सिल्वा ने सम्मेलन की सबसे बड़ी खासियत अलग-अलग शैक्षणिक क्षेत्रों के विद्वानों को एक साथ लाना है। उनके अनुसार शोधकर्ता सामान्यतः अपने-अपने विषयों और संस्थानों के भीतर काम करते हैं, लेकिन ऐसे सम्मेलन उन्हें दूसरे क्षेत्रों में हो रहे शोध को समझने और अपने अध्ययन को व्यापक संदर्भ में देखने का अवसर देते हैं।
सम्मेलन में हिमालयी क्षेत्र की समृद्ध विरासत के साथ-साथ बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर भी चर्चा हो रही है। प्रतिभागी इस बात पर विचार कर रहे हैं कि आधुनिक विकास, जलवायु परिवर्तन, पर्यटन, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली का हिमालयी समाज और उसकी पारंपरिक विरासत पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ ही पुरानी स्थापत्य शैलियों, कलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश राज्य संग्रहालय के चौड़ा मैदान परिसर में आयोजित सम्मेलन में हिमालयी इतिहास और संस्कृति से संबंधित शोध पत्र भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं। संग्रहालय के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार सम्मेलन तीन दिनों तक चलेगा और इसमें इतिहास, कला, पुरातत्व तथा संस्कृति में निरंतरता, बदलाव और संरक्षण के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की जाएगी।
सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर हिमाचल प्रदेश के शिक्षा सचिव राकेश कंवर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों और विद्यार्थियों को साझा मंच उपलब्ध कराते हैं, जिससे हिमालयी विरासत के संरक्षण के लिए नए विचार सामने आ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि अनेक भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक अनुभवों को जोड़ने वाला व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र है। ऐसे में हिमालय के अध्ययन को केवल किसी एक विषय तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इतिहास और पुरातत्व के साथ ही मानवविज्ञान, पर्यावरण, लोककला और समकालीन सामाजिक बदलावों को भी साथ लेकर अध्ययन करने की जरूरत है।
इस आयोजन में विद्यार्थियों और युवा शोधार्थियों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। युवा शोधकर्ताओं को वरिष्ठ विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने, अपने शोध प्रस्तुत करने और विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे अध्ययनों को समझने का मौका मिल रहा है। आयोजकों को उम्मीद है कि सम्मेलन से नई शोध साझेदारियां विकसित होंगी और हिमालयी विरासत पर भविष्य में संयुक्त अध्ययन को बढ़ावा मिलेगा।
तीन दिनों के दौरान प्रतिभागी हिमालय के अतीत के साथ वर्तमान में हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों और भविष्य की संरक्षण रणनीतियों पर भी चर्चा करेंगे। सम्मेलन में विशेष रूप से इस बात पर जोर है कि पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदायों और आधुनिक शोध पद्धतियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।
शिमला में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हिमालयी क्षेत्र के विविध सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को एक साथ समझने का अवसर प्रदान कर रहा है। देश और विदेश से आए विशेषज्ञों की मौजूदगी से इस चर्चा को अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण भी मिल रहा है। आयोजकों का मानना है कि इस प्रकार के संवाद से हिमालयी विरासत को संरक्षित करने के लिए अधिक प्रभावी और दीर्घकालिक प्रयासों का रास्ता खुल सकता है।
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