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रॉयल मरीन के ड्रोन में चीनी कैमरे सुरक्षा जांच से सामने आया बड़ा राज

Ratna Netam
10 Aug 2026 5:05 PM IST
रॉयल मरीन के ड्रोन में चीनी कैमरे सुरक्षा जांच से सामने आया बड़ा राज
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ब्रिटेन : रॉयल नेवी के इस्तेमाल किए जा रहे K3 स्काउट निगरानी ड्रोन्स को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंता सामने आई है। एक उच्चस्तरीय जांच में कथित तौर पर पता चला है कि इन ड्रोन्स में लगाए गए कुछ कैमरे चीन से जुड़े एक IP एड्रेस पर लगातार 'हार्टबीट कम्युनिकेशन' यानी डिजिटल सिग्नल भेज रहे थे। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब ब्रिटेन अपने सैन्य उपकरणों में चीनी तकनीक और कलपुर्जों की मौजूदगी को लेकर पहले से ही सतर्क रहा है।
इन K3 स्काउट ड्रोन्स की आपूर्ति ब्रिटिश डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर क्रैकेन टेक्नोलॉजी ग्रुप की ओर से की गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, रॉयल मरीन मार्च से इनका इस्तेमाल कर रही थी। इन ड्रोन्स को संवेदनशील सैन्य गतिविधियों और स्पेशल फोर्सेज के ट्रेनिंग क्षेत्रों के आसपास भी तैनात किया गया था। ऐसे में कैमरों के किसी विदेशी सर्वर से लगातार संपर्क में रहने की जानकारी सामने आने के बाद संभावित डेटा सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच के दौरान सामने आया कि ड्रोन में इस्तेमाल किए गए कुछ थर्ड-पार्टी कैमरे चीन में निर्मित थे। इन कैमरों की ओर से चीन स्थित सर्वर या IP एड्रेस पर लगातार हार्टबीट सिग्नल भेजे जा रहे थे। सामान्य तौर पर हार्टबीट कम्युनिकेशन किसी डिवाइस की स्थिति और उसके ऑनलाइन होने की जानकारी देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इससे संबंधित सिस्टम को यह पता चलता रहता है कि डिवाइस सक्रिय है या नहीं और नेटवर्क से जुड़ा हुआ है या नहीं।
इस मामले में सबसे ज्यादा चिंता इसलिए बढ़ी क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार ड्रोन को बंद किए जाने के बाद भी कैमरों के सक्रिय रहने की बात सामने आई। हालांकि, इस कनेक्टिविटी के जरिए संवेदनशील जानकारी वास्तव में बाहर भेजी गई थी या नहीं, यह जांच का विषय है। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मामला सामने आने के बाद इन ड्रोन्स की इंटरनेट कनेक्टिविटी को तत्काल हटा दिया।
करीब 1.2 करोड़ पाउंड की लागत वाले इस ड्रोन बेड़े की सुरक्षा को लेकर अब कई सवाल उठ रहे हैं। चिंता का एक प्रमुख विषय यह है कि इन ड्रोन्स को संवेदनशील सैन्य इलाकों के आसपास इस्तेमाल किया गया था। यदि कैमरों से किसी प्रकार का अनधिकृत डेटा बाहर जाता, तो इससे सैन्य गतिविधियों, प्रशिक्षण क्षेत्रों या वहां मौजूद कर्मियों से जुड़ी जानकारी के उजागर होने का खतरा पैदा हो सकता था।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि K3 स्काउट ड्रोन्स का इस्तेमाल केवल ब्रिटेन में ही नहीं हुआ है। यह मॉडल बाल्टिक सागर में NATO अभ्यासों में भी शामिल हो चुका है। इसके अलावा अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड द्वारा भी इस मॉडल की खरीद की गई है। ऐसे में इस मामले का दायरा केवल ब्रिटिश सुरक्षा तक सीमित नहीं माना जा रहा है और सहयोगी देशों के सैन्य उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।
ब्रिटेन की विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए ब्रिटिश सेना के उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले चीनी कलपुर्जों की तत्काल जांच की मांग की है। शैडो सिक्योरिटी मिनिस्टर एलिसा कर्न्स ने भी इस घटना पर चिंता जताई और कहा कि ब्रिटेन को चीनी तकनीक से जुड़े संभावित सुरक्षा जोखिमों को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
हालांकि, ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि यह समस्या नियमित साइबर सिक्योरिटी असेसमेंट के दौरान सामने आई। मंत्रालय के अनुसार, अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो कि रक्षा मंत्रालय का कोई संवेदनशील डेटा या सिस्टम हैक हुआ अथवा अनधिकृत रूप से बाहर ट्रांसफर किया गया। मंत्रालय की ओर से सुरक्षा खामी की पहचान के बाद जरूरी कदम उठाए गए हैं।
ड्रोन निर्माता क्रैकेन टेक्नोलॉजी ग्रुप ने भी मामले पर अपना पक्ष रखा है। कंपनी के अनुसार, थर्ड-पार्टी कैमरे अमेरिकी NDAA मानकों के अनुरूप थे। हालांकि, कैमरों के कुछ हिस्से ब्रिटेन के बाहर निर्मित थे। कंपनी ने बताया कि पूरे मामले का ऑडिट किया गया और सामने आई संभावित सुरक्षा खामियों को दूर कर दिया गया है।
यह मामला ब्रिटेन और चीन के बीच तकनीकी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तनाव के बीच सामने आया है। ब्रिटेन पहले ही चीनी कंपनी Huawei को अपने 5G नेटवर्क से बाहर कर चुका है। इसके अलावा संवेदनशील रक्षा परिसरों में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों की मौजूदगी को लेकर भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं सामने आती रही हैं।
K3 स्काउट ड्रोन विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आधुनिक सैन्य उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले छोटे से छोटे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट की सप्लाई चेन कितनी सुरक्षित है। ड्रोन जैसे उपकरणों में कैमरा, सेंसर, संचार प्रणाली और सॉफ्टवेयर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। ऐसे में किसी थर्ड-पार्टी कंपोनेंट की नेटवर्क कनेक्टिविटी भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल ब्रिटिश अधिकारियों की जांच का फोकस यह पता लगाने पर है कि कैमरों द्वारा भेजे जा रहे हार्टबीट सिग्नल की प्रकृति क्या थी और क्या इससे किसी संवेदनशील जानकारी के बाहर जाने का वास्तविक खतरा पैदा हुआ। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि अभी तक संवेदनशील डेटा के लीक होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। इसके बावजूद इस घटना ने ब्रिटेन के सैन्य उपकरणों की साइबर सुरक्षा और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है।
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