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अध्ययन में किया खुलासा: इस तरह किया अध्ययनआंखों की रेटीना से पता चल सकता है बीमारियों का

Neha Dani
21 Jun 2022 12:08 PM GMT
अध्ययन में किया खुलासा: इस तरह किया अध्ययनआंखों की रेटीना से पता चल सकता है बीमारियों का
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यह अध्ययन न्यूरोफिजियोलाजिकल परिवर्तनों के लिए प्रारंभिक साक्ष्य प्रदान करता है। इससे न्यूरो विकार के प्रकार को समझने में मदद मिलती है।

आंखें ईश्वर की अनमोल नेमत हैं। आंखों से जहां हम दुनिया की हर खूबसूरत कलाकृति, सगे-संबंधी, मित्रगण और प्राकृतिक छटा को देख सकते हैं, वहीं भावनाओं को प्रकट करने का सबसे सशक्त माध्यम भी आंखों को ही माना गया है। अब विज्ञानियों ने माना है कि तंत्रिका विकास संबंधी विकारों का संकेत भी आंखों से मिल सकता है।

यूनिवर्सिटी आफ साउथ आस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने एक नवीन अध्ययन में पाया है कि आंखों के रेटिना से हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर और आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर का संकेत मिल सकता है। एक तरह से आंखें हर स्थिति में बायोमार्कर का काम करती हैं। इस तरह का अध्ययन पहली बार किया गया है, जो अपने-आप में बेहद महत्वपूर्ण है। विज्ञानियों ने कहा कि न्यूरोडेवलपमेंटल विकारों की पहचान में रेटिना सहायक है।
इस तरह किया अध्ययन : इस अध्ययन के लिए लिए विज्ञानियों ने इलेक्ट्रोरेडिनोग्राम का उपयोग किया जो प्रकाश के संपर्क में आने पर रेटिना की गतिविधि को मापता है। इसमें पाया गया कि हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर वाले बच्चों में उच्च इलेक्ट्रोरेडिनोग्राम एनर्जी दिखाई, जबकि आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर वालों में कम ऊर्जा दिखी। फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के रिसर्च आप्टोमेटिस्ट डा. पाल कांसटेबल के मुताबिक, इस अध्ययन के प्रारंभिक निष्कर्ष भविष्य में बेहतर उपचार के लिए आशाजनक परिणाम दर्शाते हैं।
बच्चों में न्यूरोडेवलपमेंटल डिसआर्डर सामान्य है। उपरोक्त दोनों डिसआर्डर में लक्षण सामान्यत: एक जैसे होते हैं, जिससे इन रोगों का निदान लंबा और जटिल हो सकता है। शोध का उद्देश्य बच्चों में न्यूरो विकार को दूर करने में सहायक होना है। यह ध्यान रखा गया कि डिसआर्डर के प्रति रेटिना की प्रतिक्रिया कैसी होती है। विज्ञानियों ने कहा कि हम विभिन्न न्यूरोडेवलपमेंटल स्थितियों के लिए अधिक सटीक निदान विकसित करने की उम्मीद करते हैं। रेटिना सिग्नल में विभिन्न तंत्रिकाएं होती हैं, जो उन्हें उत्पन्न करती हैं। विभिन्न उपकरणों व रासायनिक प्रक्रिया से हम बच्चों में रोगों की पहचान करते हैं। यह अध्ययन न्यूरोफिजियोलाजिकल परिवर्तनों के लिए प्रारंभिक साक्ष्य प्रदान करता है। इससे न्यूरो विकार के प्रकार को समझने में मदद मिलती है।


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