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नई दिल्ली: एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन और पाकिस्तान, 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे' (CPEC) की छवि सुधारने के लिए 'चीन-पाकिस्तान सूचना गलियारे' (CPIC) का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इससे CPEC की व्यवहार्यता को लेकर जनता के बीच बढ़ रहे संदेह दूर होने की संभावना कम है। इसके उलट, इससे 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत चल रहे अन्य कार्यक्रमों पर और अधिक बारीकी से नज़र रखी जा सकती है।
'ग्रीस सिटी टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, CPIC का छिपा हुआ मकसद CPEC का बचाव करना है। CPEC को उम्मीदों पर खरा न उतरने, अधूरे प्रोजेक्ट्स और वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंताओं के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।
हालांकि इस पहल के तहत कुछ राजमार्ग (हाईवे) बनाए गए हैं, लेकिन रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास अभी भी अधूरा है। इसके अलावा, CPEC का सबसे अहम हिस्सा माने जाने वाले 'ग्वादर बंदरगाह' को भी काम करने में काफी संघर्ष करना पड़ रहा है।
CPIC को एक 'फैक्ट-चेकिंग' (तथ्यों की जांच करने वाले) और 'जनसंपर्क' तंत्र के रूप में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच मीडिया सहयोग, सूचना साझा करने, व्यापारिक जुड़ाव, थिंक-टैंक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को मजबूत करना है।
पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा, "अगर CPEC इसका शरीर और साझा भविष्य है, तो CPIC इसकी आवाज़ बनेगा। अगर CPEC हमारी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ता है, तो CPIC हमारी समझ को जोड़ेगा।"
पाकिस्तान पर चीन का 29.2 अरब डॉलर का कर्ज है, जो उसके कुल विदेशी कर्ज का लगभग एक-तिहाई है। साथ ही, CPEC के तहत बने इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजली परियोजनाओं से पर्याप्त राजस्व (कमाई) मिलने को लेकर भी चिंताएं बढ़ गई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, "बीजिंग पहले ही पाकिस्तान द्वारा कर्ज चुकाने में देरी करने पर नाराजगी जता चुका है और अक्सर कर्ज के पुनर्गठन (रीस्ट्रक्चरिंग) से इनकार कर देता है। चीन ने अनुबंधों पर फिर से बातचीत करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जबकि पाकिस्तान पर बकाया कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है।"
रिपोर्ट में बताया गया है, "जून 2026 तक CPEC बिजली परियोजनाओं का बकाया भुगतान 423 अरब पाकिस्तानी रुपये (PKR) तक पहुंच गया, जिसके कारण पाकिस्तानी नागरिकों को अपने बिजली बिलों पर 'कर्ज सेवा सरचार्ज' (debt service surcharge) देने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसे हालात में, CPEC के तहत ऊर्जा सुरक्षा बेहतर करने के वादे ने पाकिस्तानी जनता के बीच संदेह ही पैदा किया है।"
पाकिस्तान का एक क्षेत्रीय ट्रांजिट हब बनने का सपना, सपना ही बनकर रह गया है। वहीं, आम नागरिकों को लगता है कि उनका पैसा कर्ज चुकाने के नाम पर चीन जा रहा है, और CPEC का फायदा केवल पाकिस्तान के कुछ खास रसूखदार लोगों (एलीट वर्ग) तक ही सीमित रह गया है। इसके अलावा, प्रकाशन में यह भी बताया गया है कि CPEC की विफलता, BRI के ज़रिए अन्य जगहों पर अपने राजनयिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव को बढ़ाने की चीन की योजनाओं को नुकसान पहुँचाती है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "कई परियोजनाओं के अव्यावहारिक हो जाने के बाद, श्रीलंका अब BRI को लेकर हिचकिचाने लगा है; साथ ही, उसने हंबनटोटा बंदरगाह पर अपना संप्रभु नियंत्रण भी चीन के हाथों गंवा दिया है।"
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