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ईरान को लेकर अमेरिका की रणनीति पर सवाल, तेल की कीमतों में उछाल

Ratna Netam
24 Oct 2026 6:06 PM IST
ईरान को लेकर अमेरिका की रणनीति पर सवाल, तेल की कीमतों में उछाल
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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजारों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इस बीच विदेश मामलों के विशेषज्ञ वाएल अव्वाद ने दावा किया है कि ईरान को लेकर वाशिंगटन का उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत करना नहीं, बल्कि वहां सत्ता परिवर्तन कराना और मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन को अपने अनुकूल बनाना भी हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तनाव और बढ़ता है, तो इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि तेल की कीमतों, व्यापार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।अव्वाद ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि अमेरिकी नेतृत्व के बयानों में दिखाई देने वाले विरोधाभासों को समझना जरूरी है। एक तरफ सैन्य कार्रवाई और ईरान को भारी नुकसान पहुंचाने की चेतावनी दी जा रही है, तो दूसरी तरफ बातचीत के प्रस्ताव भी सामने आते हैं। उनके मुताबिक, इन बयानों के पीछे व्यापक रणनीतिक हित हो सकते हैं। हालांकि, ईरान में सत्ता परिवर्तन अमेरिका का घोषित उद्देश्य है या नहीं, यह विशेषज्ञ का आकलन है; इसे अमेरिकी सरकार की आधिकारिक नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
परमाणु वार्ता से आगे बढ़ने का दावा
वाएल अव्वाद का कहना है कि मौजूदा संघर्ष को केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम या तेल संसाधनों के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनके अनुसार, इस टकराव के पीछे क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक वर्चस्व से जुड़े सवाल भी हैंउन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल की नीतियों का व्यापक उद्देश्य मध्य पूर्व की मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था को बदलना हो सकता है। अव्वाद ने आरोप लगाया कि इस रणनीति में ईरान की सैन्य और राजनीतिक शक्ति को कमजोर करना भी शामिल है।विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि अमेरिका की घरेलू राजनीति मौजूदा घटनाक्रम को प्रभावित कर सकती है। उनके मुताबिक, नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी नेतृत्व अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय घटनाओं का नए सिरे से आकलन कर सकता है। यह भी उनका विश्लेषण है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
ईरान ने समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों को निशाना बनाने की दी चेतावनी
अव्वाद ने ईरान के जवाबी रुख पर चर्चा करते हुए कहा कि तेहरान के लिए यह संघर्ष अब अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। उनके अनुसार, ईरान की ओर से वैश्विक संकट पैदा करने की चेतावनियां अमेरिका को यह संदेश देने का प्रयास हैं कि किसी नए सैन्य हमले की स्थिति में उसे कड़ा जवाब मिल सकता है।इस बीच, रॉयटर्स की 23 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के दो वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि अमेरिका और इजरायल की ओर से दोबारा हमले होने पर खाड़ी क्षेत्र में समुद्र के नीचे बिछी संचार केबलों को निशाना बनाने की योजनाएं तैयार की गई हैं। इन केबलों को नुकसान पहुंचने पर इंटरनेट कनेक्टिविटी, वित्तीय लेनदेन और डिजिटल सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य से अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट बैंडविड्थ का एक सीमित हिस्सा गुजरता है, इसलिए वैश्विक प्रभाव का स्तर नुकसान के वास्तविक दायरे पर निर्भर करेगा।
कूटनीतिक समाधान पर भी उठाए सवाल
वाएल अव्वाद ने अमेरिका की कूटनीतिक प्रतिबद्धता पर संदेह जताया। उन्होंने दावा किया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के बाद तेहरान ने बातचीत से जुड़े कुछ प्रस्ताव रखे थे, लेकिन वाशिंगटन की तरफ से उन्हें लेकर स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली।उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में अमेरिका की प्राथमिकता बातचीत के जरिए समाधान निकालने के बजाय रणनीतिक दबाव बनाए रखने की हो सकती है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित प्रस्तावों और अमेरिकी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का स्वतंत्र आकलन जरूरी है।
कच्चा तेल 117 डॉलर के करीब, भारत की बढ़ सकती है चिंता
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का वायदा भाव 3.55 डॉलर यानी लगभग 3.1 प्रतिशत बढ़कर 116.72 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। यह 29 अप्रैल के बाद का इसका सबसे ऊंचा बंद स्तर था।भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। ऐसे में कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इसके अलावा परिवहन, माल ढुलाई और उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ने से महंगाई का जोखिम भी पैदा हो सकता है। अक्टूबर में तेल की कीमतों में उछाल के बीच भारत की थोक महंगाई पर पहले ही दबाव दिखाई दिया है।विशेषज्ञ के अनुसार, यदि पश्चिम एशिया में सैन्य टकराव और गहरा होता है, तो इसका प्रभाव तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि तनाव किस दिशा में आगे बढ़ेगा। आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत, सैन्य गतिविधियों और तेल की कीमतों पर दुनिया भर की नजर रहेगी।
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