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Islamabad इस्लामाबाद। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अफगानिस्तान में दशकों से चले आ रहे संघर्ष में पाकिस्तान की भागीदारी धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि राजनीतिक वैधता हासिल करने और वैश्विक शक्तियों, विशेषकर अमेरिका, का समर्थन पाने के उद्देश्य से थी। नेशनल असेंबली में हालिया संबोधन के दौरान आसिफ ने कहा कि शीत युद्ध के दौर से लेकर 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद तक अफगानिस्तान से जुड़े युद्धों में पाकिस्तान की संलिप्तता एक रणनीतिक फैसला था। अफगान मीडिया आउटलेट ‘आमू टीवी’ के अनुसार, उन्होंने स्पष्ट कहा, “हम इन युद्धों में इस्लाम की रक्षा या जिहाद के लिए शामिल नहीं हुए थे। हम राजनीतिक वैधता और एक महाशक्ति का समर्थन हासिल करने के लिए इसमें उतरे थे।”
आसिफ ने कहा कि सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान, जिसे ‘जिहाद’ कहा गया, वह दरअसल एक प्रॉक्सी वॉर था, जिसमें महाशक्तियों की भागीदारी थी। उन्होंने कहा, “वह जिहाद नहीं था, वह एक महाशक्ति का युद्ध था। उस युद्ध के लिए हमने अपनी शिक्षा प्रणाली तक बदल दी। आज भी उस पाठ्यक्रम को पूरी तरह से ठीक नहीं किया गया है। रक्षा मंत्री ने स्वीकार किया कि उस दौर में पाकिस्तान ने संघर्ष की कथा के अनुरूप अपना इतिहास दोबारा लिखा और समाज, राजनीति तथा धर्म को उसी ढांचे में ढालने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “हमने तथाकथित जिहाद के अनुरूप समाज, राजनीति और धर्म को पुनर्गठित किया।”
आसिफ ने यह भी माना कि सोवियत सेना की वापसी के बाद भी पाकिस्तान ने सबक नहीं सीखा और 9/11 हमलों के बाद फिर से अमेरिका के साथ खड़ा हो गया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लगभग दो दशकों तक अमेरिका-नेतृत्व वाले अफगान युद्ध में शामिल रहा। उन्होंने कहा, “एक दशक नहीं, बल्कि दो दशकों तक हमने खुद को किराए पर दे दिया। उद्देश्य केवल अमेरिकी समर्थन हासिल करना था।”
उन्होंने यह भी कहा कि 9/11 हमलों में शामिल कोई भी व्यक्ति अफगान नहीं था और न ही अफगानिस्तान एक देश के रूप में उसके लिए जिम्मेदार था। इसके बावजूद पाकिस्तान बाद के युद्ध में शामिल हो गया। आसिफ ने माना कि पाकिस्तान का नेतृत्व अतीत की गलतियों को स्वीकार करने में बार-बार विफल रहा है।
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