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नई दिल्ली: एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की बाहरी वित्तीय स्थिति काफी हद तक IMF से मिलने वाले लोन और मित्र देशों से मिलने वाली जमा राशि पर निर्भर है। इस कॉम्बिनेशन ने बार-बार आने वाले बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स संकट को तो टाला है, लेकिन लंबे समय तक आर्थिक स्थिरता लाने में नाकाम रहा है।
'डॉन' की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगातार बनी सरकारों ने पाकिस्तान के जियोपॉलिटिकल महत्व से जुड़ी विदेशी मदद पर भरोसा किया, लेकिन वे एक्सपोर्ट-आधारित विकास का टिकाऊ मॉडल बनाने में नाकाम रहीं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नतीजतन, आर्थिक विस्तार के दौर मुख्य रूप से इंपोर्ट और खपत से प्रेरित रहे, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार की बार-बार कमी हुई।
11 सितंबर के हमलों के बाद एक पूर्व सैन्य शासक को भारी मात्रा में फंड मिला, जिसमें मदद, कर्ज में राहत, विदेशी निवेश और पोर्टफोलियो फ्लो शामिल थे।
हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान के एक्सपोर्ट बेस को मजबूत करने का मौका काफी हद तक हाथ से निकल गया क्योंकि इस फंड से खपत, इंपोर्ट और रियल एस्टेट गतिविधियों को बढ़ावा मिला।
बाद में 2008 में देश को रिकॉर्ड करंट अकाउंट घाटे का सामना करना पड़ा, जिससे बड़ा आर्थिक संकट पैदा हो गया।
बाद की सरकारों को भी इस पैटर्न को तोड़ने में मुश्किल हुई।
हालांकि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) ने ऊर्जा की कमी को दूर करने और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने में मदद की, लेकिन इससे बाहरी कमजोरियों को कम करने के लिए जरूरी एक्सपोर्ट ग्रोथ नहीं मिल पाई। बढ़ते इंपोर्ट ने 2018 तक करंट अकाउंट घाटे को फिर से बढ़ा दिया।
हालांकि बाद की सरकारों ने कुछ समय के लिए घाटे को कम किया, लेकिन महामारी के दौर में राहत उपायों के बाद इंपोर्ट फिर से बढ़ गया, जबकि ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और राजनीतिक अनिश्चितता ने आर्थिक दबाव को और बढ़ा दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के रिजर्व की स्थिति को IMF प्रोग्राम और सऊदी अरब और चीन जैसे देशों से मिलने वाली जमा राशि से लगातार सहारा मिल रहा है।
हालांकि, ये फंड सीधे तौर पर आर्थिक गतिविधि या एक्सपोर्ट से कमाई पैदा नहीं करते हैं और बदलती राजनीतिक और वित्तीय स्थितियों के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान विकास-उन्मुख मदद और निवेश फ्लो पाने की स्थिति से हटकर महंगे लोन और शॉर्ट-टर्म जमा राशि पर निर्भर हो गया है। इसमें चेतावनी दी गई है कि अगर एक्सपोर्ट में सार्थक बढ़ोतरी नहीं हुई, तो आर्थिक स्थिरता लाने की कोशिशें लंबे समय तक मंदी में बदल सकती हैं, जिससे देश धीमी ग्रोथ और विदेशी मुद्रा संकट के खतरे के बीच फंस सकता है।
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