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हूतियों के मुद्दे पर पलटा पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई से बनाई दूरी
Ratna Netam
10 Sept 2026 6:24 PM IST

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इस्लामाबाद। सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद चर्चा में आए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लेकर पाकिस्तान ने महज एक दिन में अपने सुर नरम कर लिए हैं। एक दिन पहले पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैलता है और उस पर बिना उकसावे के हमला होता है तो पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुआ रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है। लेकिन गुरुवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि **हूतियों के खिलाफ किसी पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई पर फिलहाल कोई चर्चा नहीं हो रही है।
हालांकि इसे मक्का पैक्ट से पूरी तरह पीछे हटना कहना सही नहीं होगा। पाकिस्तान ने समझौते के तहत भविष्य में कार्रवाई की संभावना को खारिज नहीं किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि अभी ऐसी कोई बात चर्चा में नहीं है और जरूरत या समय आने पर समझौते के तहत कदम उठाया जाएगा। यानी इस्लामाबाद ने फिलहाल सीधे युद्ध में उतरने से दूरी बनाई है, लेकिन रक्षा समझौते की प्रतिबद्धता कायम रखने की बात भी कही है।
24 घंटे में कैसे बदला पाकिस्तान का रुख?
पाकिस्तान के रुख में यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बुधवार को रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने काफी स्पष्ट शब्दों में मक्का समझौते के सक्रिय होने की संभावना जताई थी।
उनका कहना था कि अगर यमन में जारी संघर्ष का असर सऊदी अरब तक पहुंचता है या उसके खिलाफ बिना उकसावे के आक्रामक कार्रवाई होती है तो मक्का समझौता प्रभावी हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान समझौते की शर्तों से बंधा हुआ है और जरूरत पड़ने पर उनका सम्मान करेगा।
यह बयान ऐसे समय आया था जब हूतियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्सों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए थे।
लेकिन अगले ही दिन विदेश मंत्रालय ने प्रत्यक्ष सैन्य जवाब की अटकलों पर ब्रेक लगा दिया।
प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान से जब पूछा गया कि मक्का रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान हूती हमलों के जवाब में क्या कदम उठाएगा तो उन्होंने कहा कि इस समय ऐसी किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हो रही है।
आखिर क्या है मक्का डिफेंस पैक्ट?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने अगस्त 2026 में मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों के खिलाफ भी हमला माना जाएगा। इसी वजह से इसकी तुलना NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जाने लगी।
हालांकि दोनों व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर है।
मक्का समझौते के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विवरण में यह साफ नहीं किया गया है कि किसी सदस्य पर हमला होने की स्थिति में बाकी देशों को अनिवार्य रूप से सेना भेजनी होगी या सीधे युद्ध में उतरना होगा।
यही अस्पष्टता पाकिस्तान को फिलहाल सैन्य कार्रवाई से बचने की गुंजाइश देती है।
सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों ने बढ़ाई मुश्किल
मक्का समझौते की पहली बड़ी परीक्षा हूतियों के हालिया हमलों ने पैदा की है।
ईरान समर्थित माने जाने वाले हूती लड़ाकों ने इस सप्ताह सऊदी अरब के शहरों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। हमलों में दर्जनों लोगों के घायल होने की खबर है। इसके बाद सऊदी अरब ने भी यमन में हूती ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं।
गुरुवार तक यमन में संघर्ष और तेज हो गया।
हूती लड़ाकों के रणनीतिक बंदरगाह मोखा तक पहुंचने की खबर सामने आई। यह इलाका बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बेहद करीब है, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है।
यही कारण है कि यमन की लड़ाई अब केवल एक स्थानीय संघर्ष नहीं रह गई है।
इसके असर से सऊदी सुरक्षा, लाल सागर की शिपिंग और वैश्विक तेल बाजार तक प्रभावित हो सकते हैं।
पाकिस्तान क्यों नहीं चाहता सीधे युद्ध में उतरना?
पाकिस्तान के लिए स्थिति बेहद पेचीदा है।
एक तरफ सऊदी अरब उसका दशकों पुराना रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग पहले से मौजूद है और पाकिस्तानी सैन्यकर्मी प्रशिक्षण तथा दूसरे सुरक्षा कार्यों के लिए लंबे समय से सऊदी अरब में तैनात रहे हैं।
दूसरी तरफ पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है।
हूतियों को ईरान समर्थित संगठन माना जाता है। ऐसे में पाकिस्तान अगर सीधे हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में उतरता है तो ईरान के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
पाकिस्तान मौजूदा ईरान-अमेरिका तनाव में खुद को मध्यस्थ के रूप में भी पेश करने की कोशिश कर रहा है। इसलिए हूतियों के खिलाफ सीधी जंग में उतरना उसकी कूटनीतिक स्थिति को जटिल बना सकता है।
2015 का फैसला भी बना हुआ है मिसाल
पाकिस्तान के सामने यमन युद्ध से जुड़ा एक पुराना राजनीतिक उदाहरण भी मौजूद है।
2015 में जब सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था तब पाकिस्तान पर भी उसमें शामिल होने का दबाव था।
लेकिन पाकिस्तानी संसद ने यमन संघर्ष में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी रखने का फैसला किया था।
उस समय पाकिस्तान ने सऊदी अरब की सुरक्षा के प्रति समर्थन तो जताया, लेकिन यमन के अंदर युद्ध में सेना भेजने से बचा।
आज भी यही पुराना फैसला पाकिस्तान की घरेलू राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण संदर्भ बना हुआ है।
सऊदी और ईरान दोनों से रिश्ते बचाने की चुनौती
पाकिस्तान के लिए सबसे मुश्किल संतुलन रियाद और तेहरान के बीच है।
सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए आर्थिक और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है और दोनों के बीच लंबी सीमा है।
अगर इस्लामाबाद हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई करता है तो तेहरान इसे अपने क्षेत्रीय हितों के खिलाफ कदम मान सकता है।
इसीलिए पाकिस्तान हूती हमलों की निंदा तो कर रहा है, लेकिन प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की घोषणा करने से बच रहा है।
Reuters के मुताबिक पाकिस्तान ने ईरान से उसके यमनी सहयोगी हूतियों को नियंत्रित करने के लिए भी कहा है।
क्या मक्का पैक्ट का मतलब अपने आप युद्ध में उतरना है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है।
समझौते में किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला मानने की बात है, लेकिन इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि तीनों देश तुरंत अपनी सेनाएं युद्ध में भेज दें।
विश्लेषकों के मुताबिक मदद कई तरीकों से दी जा सकती है।
पाकिस्तान अतिरिक्त एयर डिफेंस सिस्टम उपलब्ध करा सकता है, खुफिया जानकारी साझा कर सकता है, सैन्य प्रशिक्षण बढ़ा सकता है या तकनीकी सहायता दे सकता है।
यानी सामूहिक रक्षा का मतलब केवल लड़ाकू विमान भेजना या सैनिकों को हूतियों से लड़ने के लिए यमन भेजना नहीं है।
यही वजह है कि मक्का समझौते को सीधे NATO के Article 5 जैसा मानना भी सही नहीं होगा।
पाकिस्तान ने पैक्ट के विस्तार से भी किया इनकार
गुरुवार को पाकिस्तान ने मक्का गठबंधन के भविष्य को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात कही।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि फिलहाल इस गठबंधन में नए देशों को शामिल करने की कोई योजना नहीं है।
इससे उन अटकलों को झटका लगा है जिनमें इसे आगे चलकर बड़े मुस्लिम सैन्य गठबंधन या कथित 'इस्लामिक NATO' के रूप में विकसित करने की संभावना जताई जा रही थी।
पाकिस्तान का मौजूदा रुख है कि समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है और फिलहाल इसके विस्तार का एजेंडा नहीं है।
सऊदी अरब ने तेज किए हवाई हमले
उधर पाकिस्तान भले ही प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए हुए है, लेकिन सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ अपने हमले तेज कर दिए हैं।
बुधवार को सऊदी बलों ने यमन में हूती नियंत्रित क्षेत्रों पर 30 से ज्यादा हवाई हमले किए। इससे पहले हूती हमलों में सऊदी क्षेत्र में दर्जनों लोग घायल हुए थे।
गुरुवार को भी संघर्ष जारी रहा और हूतियों ने पश्चिमी यमन में आगे बढ़ने का दावा किया।
मोखा पर उनका नियंत्रण स्थापित होना सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के लिए रणनीतिक झटका हो सकता है क्योंकि यह लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार बाब अल-मंदेब के पास स्थित है।
तेल बाजार तक पहुंचा संघर्ष का असर
मध्य पूर्व की यह लड़ाई केवल सुरक्षा संकट तक सीमित नहीं है।
यमन में बढ़ते संघर्ष और क्षेत्र में जारी ईरान-अमेरिका तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें भी प्रभावित हुई हैं। गुरुवार की रिपोर्टों के मुताबिक तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी है।
बाब अल-मंदेब और होर्मुज जलडमरूमध्य दोनों वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
अगर दोनों मार्गों पर तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल और माल ढुलाई की लागत में और वृद्धि हो सकती है।
इसीलिए अमेरिका समेत कई देशों की नजर यमन और सऊदी अरब के बीच बढ़ते टकराव पर है।
पाकिस्तान के लिए पहला बड़ा टेस्ट
मक्का डिफेंस पैक्ट को बने अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है और हूती हमलों ने इसे पहले ही बड़ी परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है।
कागज पर पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब एक-दूसरे की सामूहिक सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन जमीन पर यह प्रतिबद्धता किस रूप में लागू होगी, इसका स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने पहले समझौता सक्रिय होने की बात कही, लेकिन अगले ही दिन विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि **हूतियों के खिलाफ पाकिस्तानी सैन्य प्रतिक्रिया फिलहाल विचाराधीन नहीं है।
इसलिए इसे पूरी तरह 'पैक्ट से पलटना' कहने के बजाय **तत्काल सैन्य कार्रवाई से पीछे हटना या रुख नरम करना** ज्यादा सटीक होगा।
इस्लामाबाद के सामने अब चुनौती यह है कि वह सऊदी अरब को यह भरोसा दिलाए कि मक्का समझौता सिर्फ कागजी वादा नहीं है, साथ ही खुद को हूतियों और परोक्ष रूप से ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव में जाने से भी बचाए।
आने वाले दिनों में अगर हूती हमले सऊदी अरब के अंदर और तेज होते हैं तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ सकता है। तब यह भी साफ होगा कि मक्का डिफेंस पैक्ट के तहत 'एक पर हमला सभी पर हमला' वाला सिद्धांत वास्तव में कितना प्रभावी है और पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई के बजाय किस तरह की सहायता देने का रास्ता चुनता है।
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