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तेल अवीव: इजरायल में संसदीय चुनाव के बाद सामने आए शुरुआती एग्जिट पोल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन स्पष्ट बहुमत से पीछे दिखाई दे रहा है। प्रमुख प्रसारकों के प्रारंभिक अनुमानों में उनके गुट को करीब 50 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। वहीं, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 52 से 53 सीटें मिलने का अनुमान है। हालांकि, ये मतदान के बाद के सर्वेक्षण हैं और इन्हें आधिकारिक चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता।
इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। स्पष्ट संसदीय बहुमत के लिए 61 सीटों का समर्थन चाहिए। शुरुआती अनुमानों के अनुसार, नेतन्याहू का गुट इस संख्या से लगभग 11 सीट पीछे है। विपक्ष को मामूली बढ़त मिलने के बावजूद उसके सामने भी सहयोगी जुटाने की चुनौती है। ऐसे में किसी एक पक्ष की सरकार बनना अभी तय नहीं है। अंतिम सीट वितरण और उसके बाद होने वाली बातचीत से अगली सरकार की तस्वीर स्पष्ट होगी।
शुरुआती एग्जिट पोल में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी व्यक्तिगत पार्टी बनी रह सकती है। अलग-अलग अनुमानों में उसे लगभग 24 से 25 सीटें दी गई हैं। हालांकि, सबसे बड़ी पार्टी होना और सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाना अलग स्थितियाँ हैं। लिकुड को सत्ता में बने रहने के लिए सहयोगी दलों की जरूरत होगी। दूसरी ओर, विपक्षी दलों को भी साझा नेतृत्व, नीतियों और गठबंधन की शर्तों पर सहमति बनानी होगी। इसलिए केवल किसी पार्टी की सीट संख्या से प्रधानमंत्री पद का फैसला नहीं होता।
सार्वजनिक प्रसारक कान 11 के प्रारंभिक अनुमान में नेतन्याहू गुट को 50 और आइजेनकोट के गुट को 53 सीटें मिली थीं। चैनल 12 के शुरुआती सर्वेक्षण में विपक्षी गुट को 52 सीटें मिलने का संकेत था। इन अनुमानों में अरब दलों के हिस्से लगभग 17 से 18 सीटें आने की संभावना जताई गई। अलग-अलग सर्वेक्षणों के बीच छोटे अंतर भी सरकार गठन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए सभी एग्जिट पोल को एक ही निश्चित परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
रात बढ़ने के साथ कुछ प्रसारकों ने अपने अनुमानों में संशोधन भी किया। बाद की रिपोर्टों में कान 11 और चैनल 13 ने दोनों प्रमुख गुटों को 51-51 सीटों के आसपास बताया। इससे स्पष्ट है कि 50 सीटों वाला आँकड़ा शुरुआती एग्जिट पोल का अनुमान है और आगे बदल सकता है। मतगणना तथा बाद में गिने जाने वाले मतों के कारण भी अंतिम सीट वितरण में अंतर आ सकता है। फिलहाल निश्चित निष्कर्ष यही नहीं निकाला जा सकता कि किसी पक्ष की सत्ता समाप्त हो गई है या दूसरे की सरकार बन गई है।
अरब नेतृत्व वाले दलों की संभावित सीटों के कारण उनकी भूमिका पर विशेष ध्यान है। यदि दोनों मुख्य गुट बहुमत से पीछे रहते हैं, तो अन्य दलों का समर्थन सरकार गठन में महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, वैचारिक मतभेद और राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ किसी समझौते को कठिन बना सकती हैं। किसी दल का नेतन्याहू के विरोध में होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह विपक्षी गठबंधन में शामिल होगा। समर्थन का स्वरूप और उसकी शर्तें चुनाव के बाद की बातचीत पर निर्भर करेंगी।
इजरायल की चुनाव व्यवस्था में मतदाता किसी स्थानीय उम्मीदवार के बजाय पार्टी सूची के पक्ष में मतदान करते हैं। पार्टियों को मिले मतों के आधार पर संसद में प्रतिनिधित्व तय होता है। इसी व्यवस्था के कारण कई दल नेसेट में पहुँचते हैं और सरकार बनाने के लिए गठबंधन की जरूरत पड़ती है। वर्तमान अनुमानों में भी समस्या केवल सबसे अधिक सीटें पाने की नहीं, बल्कि पर्याप्त दलों को एक साथ लाने की है। विपक्षी गुट के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं की मौजूदगी इस प्रक्रिया को जटिल बना सकती है।
आधिकारिक नतीजों के बाद सरकार गठन की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। राष्ट्रपति दलों के प्रतिनिधियों से परामर्श करके उस नेता को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास समर्थन जुटाने की बेहतर संभावना हो। इसलिए चुनावी बढ़त के बाद भी बातचीत का दौर चल सकता है। यदि समझौता नहीं होता, तो राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है। किसी वैकल्पिक नेता को अवसर मिलने या अंततः दोबारा चुनाव की स्थिति बनने की संभावना भी गठबंधन वार्ताओं के परिणाम पर निर्भर करती है।
इस चुनाव को नेतन्याहू के नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। शुरुआती एग्जिट पोल उनके गठबंधन के लिए चुनौती दिखाते हैं, लेकिन विपक्ष को भी अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आया। अब नजरें आधिकारिक मतगणना, अंतिम सीट वितरण और दलों के बीच संभावित बातचीत पर हैं। शुरुआती 50 सीटों के अनुमान से नेतन्याहू की मुश्किलों का संकेत जरूर मिलता है, मगर अगली सरकार का नेतृत्व कौन करेगा, इसका फैसला अभी बाकी है। संशोधित अनुमानों को देखते हुए अंतिम परिणाम तक सावधानी से निष्कर्ष निकालना जरूरी होगा।
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