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भारत के लिए महंगा
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई चुनौती खड़ी हो गई है। सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी आरामको ने अपने महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन नेटवर्क पर हमले के बाद भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल की आपूर्ति अगले आदेश तक रोकने की सूचना दी है। इससे भारत में तत्काल कच्चे तेल की कमी होने की आशंका सीमित मानी जा रही है, लेकिन भारतीय कंपनियों को वैकल्पिक तेल महंगे दाम और अधिक माल ढुलाई लागत पर खरीदना पड़ सकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमले के बाद परिचालन प्रभावित हुआ है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में स्थित तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल पश्चिमी तट के यानबू निर्यात केंद्र तक पहुंचाती है। इस मार्ग का महत्व इसलिए और बढ़ गया था क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही पहले से दबाव में है। पाइपलाइन बंद होने के बाद यानबू से होने वाली लोडिंग और सऊदी तेल की आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है।
भारतीय रिफाइनरियों को झटका
सऊदी आरामको की ओर से भारतीय खरीदारों को सप्लाई रोकने की सूचना ऐसे समय आई है जब वैश्विक तेल बाजार पहले ही भू-राजनीतिक तनाव और महंगे समुद्री परिवहन से जूझ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी समस्या कच्चे तेल की उपलब्धता से ज्यादा उसकी लागत हो सकती है। भारतीय रिफाइनरियां दूसरे देशों और बाजारों से वैकल्पिक बैरल खरीद सकती हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेश से खरीदता है। भारतीय रिफाइनरियों ने पिछले वर्षों में सप्लाई स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। इसलिए सऊदी सप्लाई में रुकावट का मतलब यह नहीं है कि देश में तत्काल पेट्रोलियम उत्पादों की कमी हो जाएगी। हालांकि लंबे समय तक व्यवधान जारी रहने पर रिफाइनिंग लागत और आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।
इराक और यूएई के तेल की मांग बढ़ने की संभावना
सऊदी सप्लाई प्रभावित होने के बाद एशियाई रिफाइनरियों की नजर इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे दूसरे उत्पादकों पर है। खासकर सऊदी अरब जैसे खट्टे यानी 'सॉर क्रूड' के विकल्प की मांग बढ़ सकती है। Reuters से बात करने वाले उद्योग सूत्रों ने कहा कि सीमित वैकल्पिक आपूर्ति के लिए खरीदारों की प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कीमतें ऊपर जा सकती हैं। भारत के लिए दूसरी बड़ी समस्या माल ढुलाई की लागत है। पश्चिम एशिया में संघर्ष और समुद्री मार्गों पर जोखिम के कारण टैंकर किराये में तेजी आई है। ऐसे में किसी दूसरे सप्लायर से तेल खरीदना संभव होने के बावजूद उसकी भारत तक पहुंचने की कुल लागत बढ़ सकती है। इससे सरकारी और निजी रिफाइनरियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
100 डॉलर के ऊपर बना हुआ है कच्चा तेल
वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। 18 सितंबर को Reuters के मुताबिक ब्रेंट क्रूड 104.87 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI 100.30 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। हालांकि कीमतों में उस दिन गिरावट आई लेकिन बाजार अब भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। इससे पहले सऊदी पाइपलाइन में व्यवधान और यानबू से तेल लोडिंग प्रभावित होने की खबरों ने कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बनाया था। बाजार की चिंता केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही भी सामान्य स्तर से काफी नीचे बनी हुई है जिससे दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है।
क्या भारत में पेट्रोल डीजल महंगा होगा?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सऊदी आरामको की सप्लाई रुकते ही भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम बढ़ जाएंगे। घरेलू ईंधन कीमतें केवल किसी एक सप्लायर पर निर्भर नहीं होतीं। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के साथ डॉलर-रुपया विनिमय दर रिफाइनिंग लागत टैक्स और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य नीति जैसे कई कारक इसमें भूमिका निभाते हैं। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहती है और भारतीय रिफाइनरियों को महंगे वैकल्पिक बैरल खरीदने पड़ते हैं तो कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर रिफाइनिंग मार्जिन आयात बिल और तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दिखाई दे सकता है।
सऊदी अरब तलाश रहा वैकल्पिक रास्ता
सऊदी अरब ने सप्लाई संकट को कम करने के प्रयास भी शुरू किए हैं। Reuters के मुताबिक सऊदी अरब ओमान के सोहर बंदरगाह के पास जहाज से जहाज यानी शिप-टू-शिप ट्रांसफर के जरिए अतिरिक्त कच्चे तेल की आपूर्ति करने की कोशिश कर रहा है। इससे रेड सी मार्ग में आई कमी की आंशिक भरपाई की जा सकती है। कुछ स्पॉट कार्गो ऐसे व्यापारियों को भी बेचे गए हैं जिनसे भारतीय रिफाइनरियों तक सीमित मात्रा में तेल पहुंचने की संभावना है। हालांकि ऐसे वैकल्पिक इंतजाम सामान्य सप्लाई चेन की तुलना में महंगे पड़ सकते हैं।
यूरोप भी सप्लाई संकट से प्रभावित
इस संकट का असर केवल भारत पर नहीं है। सऊदी आरामको ने कम से कम दो यूरोपीय रिफाइनिंग ग्राहकों को अगले महीने कच्चा तेल नहीं मिलने की सूचना दी है। पाइपलाइन हमले के बाद यूरोप के कुछ खरीदार वैकल्पिक सप्लाई तलाश रहे हैं। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार पोलैंड की Orlen जैसी कंपनी ने बाधित सऊदी आपूर्ति की जगह दूसरे स्रोतों से तेल खरीदने की कोशिश की है।
भारत के लिए आगे क्या?
भारत के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। पहली चुनौती पर्याप्त मात्रा में कच्चे तेल की सप्लाई बनाए रखना और दूसरी उसे उचित कीमत पर हासिल करना है। भारतीय रिफाइनरियों के पास कई देशों से तेल खरीदने का विकल्प होने के कारण तत्काल बड़े सप्लाई संकट की आशंका कम हो सकती है लेकिन यदि सऊदी पाइपलाइन लंबे समय तक पूरी क्षमता से चालू नहीं होती और होर्मुज मार्ग में व्यवधान जारी रहता है तो हालात कठिन हो सकते हैं।
आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि सऊदी अरब अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की क्षमता कितनी जल्दी बहाल करता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही कितनी सामान्य होती है। Reuters के मुताबिक सऊदी अरब पाइपलाइन की करीब आधी क्षमता जल्द बहाल करने की कोशिश कर रहा है लेकिन पूर्ण सामान्य स्थिति लौटने की समयसीमा को लेकर अभी अनिश्चितता है। फिलहाल भारत में पेट्रोल या डीजल की तत्काल कमी की पुष्टि नहीं है। वास्तविक खतरा महंगे कच्चे तेल महंगी माल ढुलाई और लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहने से पैदा होने वाले आर्थिक दबाव का है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो भारत के तेल आयात बिल से लेकर रिफाइनरियों की लागत तक इसका असर देखने को मिल सकता है।
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