
नेपाल | राजशाही की वापसी को लेकर सियासी माहौल गर्म होता जा रहा है। हाल के दिनों में राजशाही समर्थकों के बढ़ते प्रदर्शन और जनसमर्थन ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। इस बीच, विपक्षी दलों ने आपात बैठक बुलाई है, जिसमें संभावित रणनीति पर चर्चा हो रही है। प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "अगर राजशाही को थोपा गया, तो क्रांति से जवाब देंगे।"
राजशाही की मांग क्यों उठी?
नेपाल में 2008 में राजशाही समाप्त कर लोकतंत्र लागू किया गया था, लेकिन बीते कुछ वर्षों में राजतंत्र समर्थकों का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है।
- राजनीतिक अस्थिरता: बार-बार सरकारों के बदलने से जनता में असंतोष बढ़ा है।
- आर्थिक संकट: बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के कारण लोग राजशाही को बेहतर विकल्प मान रहे हैं।
- सामाजिक असंतोष: जनता का एक तबका मानता है कि राजशाही के दौरान देश अधिक स्थिर था।
विपक्षी दलों की बैठक, प्रचंड का बड़ा बयान
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर आपात बैठक बुलाई, जिसमें संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री प्रचंड ने राजशाही की वापसी को लोकतंत्र पर खतरा बताया और इसे रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाने की बात कही। उन्होंने कहा, “हमने क्रांति से लोकतंत्र स्थापित किया है, अगर जरूरत पड़ी, तो फिर से संघर्ष के लिए तैयार हैं।”
आगे क्या?
नेपाल में राजशाही बनाम लोकतंत्र की यह बहस और तेज हो सकती है। आने वाले दिनों में जनता, राजनीतिक दलों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाएं इस मुद्दे को और बड़ा बना सकती हैं। क्या नेपाल एक बार फिर राजशाही की ओर लौटेगा या लोकतंत्र बना रहेगा? यह देखना दिलचस्प होगा।





