विश्व
अमेरिका में 2 लाख भारतीय मूल के वोटरों के नाम कटे, ट्रम्प की पार्टी के सामने मिडटर्म चुनाव की चुनौती
jantaserishta.com
9 Oct 2026 12:01 PM IST

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नई दिल्ली: अमेरिका में आगामी मिडटर्म चुनावों से पहले मतदाता सूची को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दी गई जानकारी के मुताबिक, 26 राज्यों में लगभग 2 लाख भारतीय मूल के मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। इन सभी राज्यों में रिपब्लिकन पार्टी की सरकार है।
अमेरिका में भारतीय मूल के मतदाताओं की कुल संख्या करीब 21 लाख बताई गई है। ऐसे में इस समुदाय के वोट चुनावी नतीजों पर असर डाल सकते हैं। 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनावों को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के सामने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत रखने की चुनौती है।
भारतीय मूल के मतदाताओं का झुकाव लंबे समय से डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ बताया जाता रहा है। वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में इस समुदाय के करीब 65 प्रतिशत लोगों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कमला हैरिस को वोट दिया था। यही वजह है कि आगामी चुनावों में इन मतदाताओं की भूमिका पर खास ध्यान दिया जा रहा है।
वोटर लिस्ट की जांच के पीछे क्या है वजह?
ट्रम्प प्रशासन अमेरिका की मतदाता सूचियों की समीक्षा कर रहा है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य उन लोगों के नाम हटाना है, जो मतदान के पात्र नहीं हैं। प्रशासन के मुताबिक, इससे चुनावी गड़बड़ियों को रोकने और मतदान व्यवस्था को सुरक्षित बनाने में मदद मिल सकती है।
इसी उद्देश्य से ट्रम्प ‘सेव अमेरिका एक्ट’ का समर्थन कर रहे हैं। फरवरी में अमेरिकी संसद के निचले सदन ने इस विधेयक को मंजूरी दी थी। इसके तहत मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने वाले लोगों को अपनी अमेरिकी नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र या पासपोर्ट जैसे दस्तावेज दिखाने होंगे।
इसके साथ ही वोट डालने के लिए पहचान पत्र से जुड़े नियमों को भी सख्त बनाने का प्रस्ताव है। ये नियम मतदान केंद्र पर जाकर वोट देने और डाक के जरिए मतदान करने, दोनों पर लागू होंगे।
सख्त नियमों को लेकर ट्रम्प प्रशासन पर सवाल
ट्रम्प कई बार अमेरिकी चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली होने का दावा कर चुके हैं। हालांकि, दी गई जानकारी के अनुसार, इन आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत नहीं मिले हैं।
इन नए नियमों का विरोध करने वालों का कहना है कि दस्तावेजों की अनिवार्यता बढ़ने से उन नागरिकों को परेशानी हो सकती है, जो मतदान के योग्य हैं, लेकिन उनके पास जन्म प्रमाण पत्र या पासपोर्ट नहीं है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने भी इन कदमों पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि ट्रम्प प्रशासन चुनावी प्रक्रिया में बदलाव करके मिडटर्म चुनावों को प्रभावित करना चाहता है। इस तरह मतदाता पहचान और नागरिकता के दस्तावेजों का मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
ट्रम्प के कामकाज से नाराजगी, रिपब्लिकन उम्मीदवार बना रहे दूरी
मिडटर्म चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं के बीच ट्रम्प से दूरी बनाने के संकेत मिल रहे हैं। उनकी लोकप्रियता में गिरावट को देखते हुए कई उम्मीदवारों को आशंका है कि राष्ट्रपति के साथ जुड़ाव उनके चुनावी प्रदर्शन पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
कुछ रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने अपनी चुनावी वेबसाइटों से ट्रम्प और उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे का उल्लेख हटा दिया है। वहीं, कुछ नेता उनके साथ चुनावी मंच साझा करने से भी बच रहे हैं।
AP-NORC सर्वे के मुताबिक, केवल 30 प्रतिशत अमेरिकी ट्रम्प के कामकाज से संतुष्ट हैं। अर्थव्यवस्था को लेकर उनकी स्वीकृति दर 26 प्रतिशत है, जबकि महंगाई से निपटने के मामले में यह घटकर 17 प्रतिशत रह जाती है। सर्वे में 65 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी लोगों ने बढ़ती कीमतों के लिए ट्रम्प की नीतियों को जिम्मेदार माना है।
संसद में बहुमत बचाना रिपब्लिकन पार्टी के लिए जरूरी
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति चुनावों के बीच होते हैं। इनके जरिए कांग्रेस के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—के सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इन नतीजों से तय होता है कि अगले दो वर्षों तक संसद में किस पार्टी की कितनी ताकत रहेगी।
सीनेट में कुल 100 सीटें हैं, जिनमें से इस बार 35 सीटों पर मतदान होना है। दूसरी ओर, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर चुनाव होंगे। फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट में 53 और हाउस में 218 सीटें हैं।
अगर रिपब्लिकन पार्टी बहुमत खो देती है, तो ट्रम्प प्रशासन के लिए संसद से अपने विधेयक पारित कराना कठिन हो सकता है। ऐसे में सरकार को कानून बनाने के लिए दूसरे दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए आगामी मिडटर्म चुनाव ट्रम्प और उनकी पार्टी के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
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