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जिनेवा: संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने मानवाधिकार वकील ईमान मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा के ख़िलाफ़ पाकिस्तान द्वारा "अस्पष्ट और बहुत व्यापक आतंकवाद-रोधी" प्रावधानों के इस्तेमाल की कड़ी निंदा की है। साथ ही, उन्होंने अधिकारियों से उन्हें तुरंत रिहा करने और उन पर लगे "बेबुनियाद" आपराधिक और आतंकवाद के आरोपों को हटाने की मांग की है।
यह बयान तब आया जब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने 17 सितंबर को सोशल मीडिया पोस्ट मामले में दोनों वकीलों - मज़ारी-हाज़िर और उनके पति चट्टा - को ज़मानत दे दी और उनकी सज़ा पर रोक लगा दी, लेकिन इसके कुछ ही समय बाद उन्हें फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया।
विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि उन्होंने पहले भी स्थानीय कार्यकर्ताओं का समर्थन करने और सेना की आलोचना करने वाली सोशल मीडिया पोस्ट के लिए दोनों मानवाधिकार वकीलों को दोषी ठहराए जाने पर चिंता जताई थी।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी, "ज़मानत मिलने के तुरंत बाद किसी पुराने मामले को सामने लाना ऐसा लगता है जैसे आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकारों की वकालत करने के लिए सज़ा देने के तौर पर किया जा रहा हो। हमने जनवरी से मज़ारी-हाज़िर और चट्टा के ख़िलाफ़ लगातार चल रही कार्यवाही पर नज़र रखी है; ऐसा लगता है कि इसका मकसद इन वकीलों को सज़ा देना और डराना-धमकाना है, साथ ही पूरे पेशे को एक डरावना संदेश देना भी है।"
उनकी दोबारा गिरफ़्तारी के बाद, इस्लामाबाद की आतंकवाद-रोधी अदालत ने इस जोड़े को 30 दिनों तक हिरासत में रखने और उनसे पूछताछ करने की पुलिस की अपील ठुकरा दी और इसके बजाय उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया। उन्होंने बताया कि 22 सितंबर, 2026 को इस्लामाबाद की आतंकवाद-रोधी अदालत ने इस जोड़े की ज़मानत याचिकाएं लौटा दीं क्योंकि उनमें हस्ताक्षरित 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (अधिकार-पत्र) नहीं थे।
विशेषज्ञों ने मानवाधिकारों को सीमित करने और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने, उनकी रक्षा करने और उनका बचाव करने के अधिकार के सही इस्तेमाल में बाधा डालने के लिए आतंकवाद-रोधी प्रावधानों के इस्तेमाल की कड़ी आलोचना की।
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार सरकारों को वकीलों को डराने-धमकाने, परेशान करने और अनुचित हस्तक्षेप से बचाना चाहिए, साथ ही अपनी मान्यता प्राप्त पेशेवर ज़िम्मेदारियां निभाने के लिए उन पर मुक़दमा चलाने से भी बचाना चाहिए, विशेषज्ञों ने कहा कि ये मानक वकीलों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की भी रक्षा करते हैं। उन्होंने कहा, "पाकिस्तान को वकीलों द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल करने या उनके कानूनी काम से जुड़े सभी आरोप वापस लेने चाहिए और उस जोड़े को तुरंत रिहा करने का आदेश देना चाहिए। उन्हें अपनी पसंद के वकील, अपने परिवार और ज़रूरी मेडिकल देखभाल तक पूरी पहुँच मिलनी चाहिए।"
इस हफ़्ते की शुरुआत में, इंटरनेशनल फ़ेडरेशन फ़ॉर ह्यूमन राइट्स (FIDH) और वर्ल्ड ऑर्गनाइज़ेशन अगेंस्ट टॉर्चर (OMCT) समेत कुल 15 अंतरराष्ट्रीय सिविल सोसाइटी संगठनों ने पाकिस्तानी मानवाधिकार वकील मज़ारी-हाज़िर और उनके पति छट्ठा को जनवरी से मनमाने ढंग से हिरासत में रखे जाने पर गहरी चिंता जताई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी सज़ा पर रोक लगाने और उन्हें ज़मानत देने के बावजूद उन्हें हिरासत में रखा गया है।
संयुक्त बयान में कहा गया, "अभिव्यक्ति की आज़ादी, शांतिपूर्ण सभा, मानवाधिकारों की वकालत और वकीलों के तौर पर अपने पेशेवर कर्तव्यों के कानूनी पालन के आधार पर लगाए गए सभी आरोप वापस लिए जाएं। उनकी दोबारा गिरफ़्तारी के तथ्यात्मक और कानूनी आधार का खुलासा किया जाए और हाल की कार्रवाई में एंटी-टेररिज़्म एक्ट के मनमाने इस्तेमाल की सख़्त न्यायिक जाँच सुनिश्चित की जाए।"
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