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Washington वॉशिंगटन। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा है कि तकनीक निवेश और निजी क्षेत्र की मजबूती के बावजूद वैश्विक ग्रोथ के अनुमान को घटा दिया गया है। भारत, जापान, यूएई, नीदरलैंड और चिली के पत्रकारों के साथ एक समूह साक्षात्कार के दौरान आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गौरींचस ने कहा कि पहले 2026 के लिए वैश्विक ग्रोथ को 3.4 प्रतिशत तक बढ़ाने का अनुमान था, लेकिन अब यह घटकर करीब 3.1 प्रतिशत रह गया है।
उन्होंने कहा कि यह गिरावट ऐसे समय आई है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था टैरिफ और व्यापार नीति से जुड़े झटकों के बाद धीरे-धीरे स्थिर हो रही थी। गौरींचस ने बताया कि पहले अर्थव्यवस्था में अच्छा मोमेंटम था, जिसे बेहतर वित्तीय स्थितियों और एआई तकनीक के बढ़ते उपयोग का समर्थन मिला था। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र ने भी तेजी से सप्लाई चेन को नए रास्तों से जोड़कर हालात संभाले, जिससे व्यापार तनाव के असर को कुछ हद तक कम किया जा सका।
आईएमएफ के अनुसार, टैरिफ और व्यापार से जुड़ी अनिश्चितता ने पहले वैश्विक ग्रोथ को 0.5 से 0.6 प्रतिशत तक प्रभावित किया था, लेकिन अब इसका असर कम होता जा रहा है। हालांकि, अब मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने नई चुनौती पैदा कर दी है, खासकर ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई में बाधा के कारण। गौरींचस ने कहा कि नुकसान की सीमा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संघर्ष कितने समय तक चलता है और ऊर्जा बाजार पर इसका कितना असर पड़ता है।
उन्होंने बताया कि अगर यह संघर्ष ज्यादा समय तक नहीं चलता और तेल-ऊर्जा सप्लाई सामान्य हो जाती है, तो इसका असर मुख्य रूप से इसी साल तक सीमित रह सकता है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो इसके असर लंबे समय तक दिख सकते हैं। खासकर अगर वित्तीय स्थितियां कड़ी हो जाती हैं, तो इसका असर एक-दो साल से ज्यादा समय तक रह सकता है।
आईएमएफ ने यह भी चेतावनी दी कि बढ़ती खाद्य कीमतें और वित्तीय अस्थिरता कमजोर देशों के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। संस्था ने कहा कि इस साल की शुरुआत में उम्मीद थी कि व्यापार तनाव कम होने और तकनीक निवेश बढ़ने से वैश्विक ग्रोथ में सुधार होगा, लेकिन मिडिल ईस्ट संकट ने इस रफ्तार को बाधित कर दिया है।
अब ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और महंगाई का दबाव बढ़ने से वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
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