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सर्बिया में पीएम बनने की दौड़ में वुसिक
बेलग्रेड: सर्बिया में 25 अक्टूबर को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले राजनीतिक मुकाबला तेज हो गया है। पूर्व राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक अब प्रधानमंत्री बनने की कोशिश में अपनी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। दूसरी ओर, लंबे समय से सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थकों ने राजधानी बेलग्रेड में विशाल रैली आयोजित की। 22 अक्टूबर को हुई इस सभा में बड़ी संख्या में लोग जुटे और राजनीतिक बदलाव के समर्थन में नारे लगाए। यह चुनाव वुसिक के राजनीतिक प्रभाव और छात्र आंदोलन की चुनावी ताकत, दोनों की परीक्षा माना जा रहा है। विरोध प्रदर्शनों से आगे बढ़कर छात्र समर्थित आंदोलन ने अब उम्मीदवारों की सूची के साथ संसदीय मुकाबले में प्रवेश किया है। मतदान से पहले किसी पक्ष की जीत निश्चित नहीं है और चुनाव परिणाम से ही अगली सरकार की तस्वीर स्पष्ट होगी।
राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देकर बदली भूमिका
वुसिक ने 27 सितंबर को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद उन्होंने संसदीय चुनाव में अपनी पार्टी की अगुआई करते हुए प्रधानमंत्री पद की दावेदारी आगे बढ़ाई। उनका दूसरा राष्ट्रपति कार्यकाल पूरा होने में सात महीने से अधिक समय बाकी था। संविधान के तहत वे लगातार तीसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते थे। सर्बिया में प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं होता। मतदाता संसद के लिए प्रतिनिधि चुनते हैं और सरकार बनाने के लिए संसदीय समर्थन जरूरी होता है। यदि वुसिक की पार्टी पर्याप्त बहुमत या सहयोग जुटाती है, तो उनके प्रधानमंत्री चुने जाने का रास्ता बन सकता है। इसलिए उनके अभियान को राष्ट्रपति चुनाव की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। अब मुकाबले का केंद्र संसद में सीटें जीतना और सरकार के गठन के लिए जरूरी समर्थन हासिल करना है।
छात्र आंदोलन बना राजनीतिक चुनौती
वुसिक के सामने सबसे बड़ी चुनौती छात्र समर्थित चुनावी मोर्चे से आ रही है। लगभग दो वर्षों से जारी आंदोलन ने भ्रष्टाचार, जवाबदेही और संस्थाओं के कामकाज को अपने प्रमुख मुद्दे बनाए हैं। शुरुआत में सड़क पर प्रदर्शन करने वाला यह समूह अब मतदाताओं से राजनीतिक बदलाव के लिए समर्थन मांग रहा है। छात्र आंदोलन की विशेषता उसकी सामूहिक निर्णय प्रक्रिया बताई जाती है। विभिन्न शिक्षण संस्थानों की सभाओं में प्रस्तावों और कार्यक्रमों पर चर्चा तथा मतदान होता है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि वे लोकतांत्रिक भागीदारी और अलग-अलग विचारों के सम्मान को महत्व देते हैं।
यह व्यवस्था किसी एक प्रमुख नेता पर केंद्रित अभियान से अलग है। हालांकि, चुनाव में समर्थन को सीटों में बदलना आंदोलन के लिए नई चुनौती होगी। सड़कों पर जुटने वाली भीड़ और मतदान का अंतिम परिणाम हमेशा एक जैसा नहीं होता।
रेलवे स्टेशन हादसे के बाद शुरू हुआ विरोध
विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन पर हुआ हादसा है। स्टेशन की छत का एक हिस्सा गिरने से 16 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद जवाबदेही की मांग उठी और छात्रों के नेतृत्व में प्रदर्शन शुरू हुए। प्रदर्शनकारियों ने निर्माण परियोजनाओं में कथित भ्रष्टाचार और लापरवाही पर सवाल उठाए। समय के साथ आंदोलन का दायरा बढ़ा और यह सरकार के कामकाज के व्यापक विरोध में बदल गया। वुसिक सितंबर में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उतरने की बात कह चुके थे, उसी समय भी बेलग्रेड में हजारों विपक्ष समर्थक छात्र आंदोलन के पक्ष में जुटे थे। हादसे को लेकर उठे सवालों ने चुनावी बहस में सार्वजनिक परियोजनाओं की निगरानी और सत्ता की जवाबदेही को प्रमुख स्थान दिया है। हालांकि, किसी खास आरोप की जिम्मेदारी संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगी।
वुसिक भी समर्थकों के बीच पहुंचे
छात्र समर्थित रैली के साथ वुसिक ने भी चुनाव प्रचार जारी रखा है। उन्होंने अक्टूबर की शुरुआत में बेलग्रेड के बड़े इनडोर एरिना में समर्थकों को संबोधित करते हुए अपना अभियान आगे बढ़ाया था। उस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से समर्थक पहुंचे थे। वुसिक पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों भूमिकाओं में रहे हैं। उनकी पार्टी सत्ता में निरंतरता बनाए रखने की कोशिश कर रही है, जबकि विरोधी बदलाव के लिए वोट मांग रहे हैं। इसी कारण चुनाव में पार्टी के संगठनात्मक आधार और लंबे समय से जारी विरोध आंदोलन के बीच मुकाबला दिखाई दे रहा है।
आरोपों के बीच निष्पक्ष मतदान पर नजर
चुनावी माहौल में विपक्ष और कार्यकर्ताओं ने दबाव, धमकियों तथा राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं जताई हैं। वुसिक के आलोचक मीडिया की स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार के मुद्दे भी उठा रहे हैं। इन आरोपों को आरोप के रूप में ही देखना जरूरी है; वुसिक अपने खिलाफ लगाए गए व्यापक आरोपों से इनकार करते रहे हैं। अब मतदाताओं का निर्णय तय करेगा कि वुसिक प्रधानमंत्री के रूप में वापसी कर पाएंगे या छात्र समर्थित मोर्चा सत्ता का समीकरण बदलेगा। नतीजों के साथ संसद में बनने वाला बहुमत और संभावित सहयोग भी महत्वपूर्ण होगा। मतदान से पहले दोनों पक्ष अपने समर्थकों को बूथ तक पहुंचाने पर जोर दे रहे हैं।
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