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Delhi दिल्ली। साल 2025 वैश्विक राजनीति के इतिहास में उस मोड़ की तरह दर्ज हुआ, जब सत्ता के शिखर पर बैठे नेताओं को अदालतों और संसदों के सामने जवाब देना पड़ा। यह वर्ष इस अर्थ में असाधारण रहा कि लोकतंत्र के अलग-अलग मॉडलों वाले देशों में भी एक साझा संदेश उभरा—कानून से ऊपर कोई नहीं। बांग्लादेश से लेकर दक्षिण कोरिया तक, न्यायिक और संवैधानिक फैसलों ने सत्ता की ताक़त और उसकी सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित किया।
17 नवंबर का दिन अवामी लीग की अध्यक्ष और बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री के लिए मौत का पैगाम लेकर आया। बांग्लादेश में वर्ष का सबसे चौंकाने वाला फैसला सामने आया, जब अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराते हुए सजा-ए-मौत सुनाई। यह फैसला अनुपस्थिति में सुनाया गया, लेकिन इसके राजनीतिक और कूटनीतिक निहितार्थ बेहद गहरे रहे।
अदालत ने माना कि 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान राज्य की शक्ति का जिस तरह इस्तेमाल हुआ, उसने नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल दिया। 2025 में आए इस निर्णय ने न केवल बांग्लादेश की राजनीति को झकझोर दिया, बल्कि दक्षिण एशिया में सत्ता और जवाबदेही की बहस को भी तेज़ कर दिया। यह पहला मौका था जब इतने लंबे समय तक सत्ता में रही किसी नेता के खिलाफ देश की ही अदालत ने इतना कठोर फैसला सुनाया।
इस फैसले की चौतरफा निंदा हुई। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसका विरोध किया। उनके प्रवक्ता स्टेफन दुजारिक ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र हर स्थिति में मौत की सजा के खिलाफ है। लैटिन अमेरिका में पेरू की राजनीति ने भी इसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाया। वहां की संसद ने 10 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रपति डीना बोलुआर्ते को संसद ने पद से हटाकर यह दिखाया कि जनादेश के बावजूद सत्ता निरंकुश नहीं हो सकती। विरोध प्रदर्शनों, भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन की नैतिक वैधता पर उठे सवालों के बीच संसद का यह फैसला 2025 के सबसे अहम राजनीतिक घटनाक्रमों में शामिल रहा।
उधर, पूर्वी एशिया में दक्षिण कोरिया ने भी लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत का प्रदर्शन किया। राष्ट्रपति यून सुक येओल के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया 2025 में अपने निर्णायक चरण में पहुंची। संसद द्वारा लगाए गए आरोपों पर संवैधानिक अदालत में लंबा ट्रायल चला, जिसमें सत्ता के दुरुपयोग और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के सवाल केंद्र में रहे। यह मामला केवल एक राष्ट्रपति के भविष्य का नहीं था, बल्कि इस बात की परीक्षा था कि संकट की घड़ी में संस्थाएं कितनी स्वतंत्र और मजबूत हैं। दक्षिण कोरिया, जहां पहले भी राष्ट्राध्यक्षों पर कानूनी कार्रवाई का इतिहास रहा है, वहां 2025 ने यह परंपरा और गहरी कर दी।
यूरोप के बाल्कन क्षेत्र में बोस्निया-हर्जेगोविना ने भी कड़ा संदेश दिया। फरवरी 2025 में अदालत के फैसले के बाद मिलोराड डोडिक का राजनीतिक अध्याय लगभग समाप्त हो गया। यह फैसला अलगाववादी राजनीति और संवैधानिक ढांचे के टकराव का प्रतीक बनकर उभरा, जिसने यूरोप में लोकतंत्र की सीमाओं और मजबूती दोनों को उजागर किया।
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