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नई दिल्ली। भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) को लेकर अपना पुराना और स्पष्ट रुख दोहराया है। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1972 में हुए शिमला समझौते के बाद संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। विदेश मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की इस्लामाबाद स्थित UNMOGIP कार्यालय की हालिया यात्रा को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में सामने आई है।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा कि इस विषय पर भारत का रुख लंबे समय से एक जैसा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिमला समझौते के बाद भारत UNMOGIP की भूमिका को प्रासंगिक नहीं मानता।संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 6 अक्टूबर को पाकिस्तान की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान इस्लामाबाद में UNMOGIP के कार्यालय का दौरा किया था। इसी यात्रा के संदर्भ में विदेश मंत्रालय से भारत की प्रतिक्रिया मांगी गई थी।
विदेश मंत्रालय ने दोहराया भारत का पुराना रुख
शुक्रवार को आयोजित साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से संयुक्त राष्ट्र महासचिव की इस्लामाबाद यात्रा को लेकर सवाल पूछा गया।इस पर उन्होंने कहा, **"हमारा लगातार यही रुख रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के बाद UNMOGIP की प्रासंगिकता खत्म हो गई है।"**विदेश मंत्रालय के इस बयान से स्पष्ट है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह के संबंध में अपनी पूर्व निर्धारित नीति में कोई बदलाव नहीं किया है।भारत लंबे समय से यह मानता आया है कि शिमला समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा से संबंधित व्यवस्था का स्वरूप बदल गया था।इसी आधार पर भारत UNMOGIP की भूमिका को अनावश्यक मानता है।
एंटोनियो गुटेरेस ने किया था इस्लामाबाद कार्यालय का दौरा
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 6 अक्टूबर को पाकिस्तान की आधिकारिक यात्रा के दौरान इस्लामाबाद स्थित UNMOGIP कार्यालय का दौरा किया था।उनकी इस यात्रा के बाद भारत में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह की भूमिका और प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठे।विदेश मंत्रालय से जब इस दौरे पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत की स्थापित स्थिति दोहराई।हालांकि, उपलब्ध जानकारी में भारत की ओर से महासचिव की यात्रा के संबंध में किसी अलग राजनयिक कार्रवाई या औपचारिक विरोध का उल्लेख नहीं किया गया है।विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया मुख्य रूप से UNMOGIP की प्रासंगिकता के प्रश्न तक सीमित रही।
क्या है UNMOGIP?
UNMOGIP का पूरा नाम यूनाइटेड नेशंस मिलिट्री ऑब्जर्वर ग्रुप इन इंडिया एंड पाकिस्तान है। हिंदी में इसे भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह कहा जाता है।इस समूह की स्थापना वर्ष 1949 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम की निगरानी के उद्देश्य से की गई थी।उस समय जम्मू-कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष के बाद युद्धविराम की व्यवस्था लागू हुई थी।संयुक्त राष्ट्र के सैन्य पर्यवेक्षकों को युद्धविराम से संबंधित घटनाओं की निगरानी और रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गई थी।समय के साथ भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तथा सैन्य परिस्थितियों में बदलाव आया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर UNMOGIP की मौजूदगी बनी रही।
1972 का शिमला समझौता क्यों महत्वपूर्ण?
भारत और पाकिस्तान के बीच 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ था। यह समझौता वर्ष 1971 के युद्ध के बाद दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में किया गया था।समझौते पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे।शिमला समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने और द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने पर सहमति जताई थी।इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में पूर्व युद्धविराम रेखा के स्थान पर नियंत्रण रेखा यानी लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) को मान्यता दी गई।भारत का तर्क है कि शिमला समझौते के बाद पुरानी युद्धविराम निगरानी व्यवस्था का आधार बदल गया और इस कारण UNMOGIP की प्रासंगिकता समाप्त हो गई।
भारत और संयुक्त राष्ट्र की स्थिति में अंतर
UNMOGIP को लेकर भारत और संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत स्थिति एक जैसी नहीं है।भारत का मानना है कि शिमला समझौते के बाद समूह की भूमिका अप्रासंगिक हो गई है। वहीं, संयुक्त राष्ट्र का दृष्टिकोण है कि UNMOGIP का मूल अधिदेश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से संबंधित है और उसे समाप्त करने का निर्णय सुरक्षा परिषद के स्तर पर ही लिया जा सकता है।यही कारण है कि भारत की आपत्ति के बावजूद UNMOGIP संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के अंतर्गत मौजूद है।इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का बयान उसकी राजनयिक और कानूनी स्थिति को व्यक्त करता है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि संयुक्त राष्ट्र ने औपचारिक रूप से समूह का अधिदेश समाप्त कर दिया है।
भारत द्विपक्षीय समाधान पर देता रहा है जोर
भारत की विदेश नीति में पाकिस्तान के साथ लंबित मुद्दों को द्विपक्षीय माध्यम से सुलझाने पर लगातार जोर दिया जाता रहा है।शिमला समझौता इस नीति का प्रमुख आधार है। भारत का कहना रहा है कि दोनों देशों के बीच विवादों का समाधान आपसी बातचीत और स्थापित द्विपक्षीय व्यवस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए।UNMOGIP के संबंध में भी भारत का रुख इसी व्यापक नीति के अनुरूप है।विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार की ब्रीफिंग में किसी नई नीति की घोषणा करने के बजाय इसी पुराने दृष्टिकोण को दोहराया।
गुटेरेस की यात्रा के बाद फिर चर्चा में आया मुद्दा
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की इस्लामाबाद स्थित UNMOGIP कार्यालय की यात्रा के बाद समूह की भूमिका एक बार फिर चर्चा में आ गई है।यह मुद्दा भारत-पाकिस्तान संबंधों के साथ संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक भूमिका से भी जुड़ा हुआ है।भारत ने स्पष्ट किया है कि शिमला समझौते के बाद वह इस समूह को प्रासंगिक नहीं मानता। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के अंतर्गत समूह का अस्तित्व बना हुआ है।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को भारत की स्थापित स्थिति दोहराते हुए कहा कि वर्ष 1972 के शिमला समझौते के बाद UNMOGIP की प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। यह प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के 6 अक्टूबर को इस्लामाबाद स्थित समूह के कार्यालय के दौरे के संदर्भ में आई है।
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