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तीन दशक बाद मिला लापता पर्वतारोहियों का सुराग आल्प्स में खुला राज
स्विट्जरलैंड: स्विस आल्प्स में एक रहस्यमयी मामले का आखिरकार खुलासा हो गया है। तीन दशक से अधिक समय से लापता दो पर्वतारोहियों के शव ग्लेशियर पिघलने के बाद बरामद हुए हैं। डीएनए जांच से पुष्टि हुई है कि ये दोनों पर्वतारोही 1992 में लापता हुए बेल्जियम के नागरिक थे।
स्विट्जरलैंड के वालैस क्षेत्र में ट्रिफ्ट ग्लेशियर पर एक यात्री को मानव अवशेष दिखाई दिए थे। इसके बाद स्थानीय प्रशासन और बचाव दल ने अभियान चलाकर अवशेषों को बरामद किया। जांच के लिए इन्हें फॉरेंसिक विशेषज्ञों के पास भेजा गया, जहां डीएनए परीक्षण के बाद उनकी पहचान की गई।
बताया जा रहा है कि दोनों पर्वतारोही वर्ष 1992 में स्विस आल्प्स के वाइसमीस पर्वत क्षेत्र में चढ़ाई के दौरान लापता हो गए थे। उस समय काफी खोज अभियान चलाया गया था, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल सका था। करीब 34 साल बाद ग्लेशियर के पीछे हटने से उनके अवशेष सामने आए और लंबे समय से चले आ रहे रहस्य का अंत हुआ।
लापता पर्वतारोहियों की उम्र उस समय 39 और 41 वर्ष थी। दोनों बेल्जियम के रहने वाले थे और पर्वतारोहण के लिए स्विस आल्प्स पहुंचे थे। उनकी गुमशुदगी के बाद परिवार लंबे समय तक उनके बारे में जानकारी का इंतजार करता रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसके चलते कई दशकों से बर्फ में दबे पुराने अवशेष अब सामने आने लगे हैं। स्विस आल्प्स में भी हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां ग्लेशियरों के पीछे हटने से पुराने पर्वतारोहियों के अवशेष मिले हैं।
ग्लेशियरों में फंसे रहने के कारण इन पर्वतारोहियों के शव इतने लंबे समय तक सुरक्षित रहे। वैज्ञानिकों के अनुसार, बर्फीले वातावरण में शरीर के अवशेषों का क्षरण बहुत धीमा हो जाता है, जिसके कारण कई वर्षों बाद भी उनकी पहचान संभव हो पाती है। इस घटना ने एक बार फिर पर्वतारोहण के जोखिम और बदलते पर्यावरणीय हालात पर ध्यान आकर्षित किया है। आल्प्स जैसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलता है और बर्फीले इलाकों में लापता लोगों की तलाश बेहद कठिन होती है।
34 साल पुराने इस मामले के सुलझने से मृत पर्वतारोहियों के परिवारों को आखिरकार जवाब मिल गया है। हालांकि यह घटना उन चुनौतियों को भी उजागर करती है, जिनका सामना ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में अभियान चलाने वाले पर्वतारोहियों और बचाव दलों को करना पड़ता है।
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