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Pakistan पाकिस्तान: कानूनी सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियों और हिरासत में यातना (कस्टोडियल एब्यूज) के मामलों को लेकर एक नई रिपोर्ट ने चिंता जताई है। नेशनल कमीशन फॉर ह्यूमन राइट्स द्वारा संयुक्त राष्ट्र की संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी समिति को सौंपी गई इस वैकल्पिक रिपोर्ट में कई गंभीर मुद्दे उजागर किए गए हैं। यह रिपोर्ट यातना के खिलाफ कन्वेंशन के तहत पाकिस्तान की प्रतिबद्धताओं की समीक्षा से पहले प्रस्तुत की गई है। इसमें टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022 के प्रभावी क्रियान्वयन में कमी और हिरासत में अत्याचार के मामलों को रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने 2010 में यातना विरोधी कन्वेंशन को मंजूरी दी थी, लेकिन इसके बाद भी पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और जवाबदेही की कमी बनी रही। हालांकि कुछ प्रगति हुई है, फिर भी कई महत्वपूर्ण समस्याएं अब भी कायम हैं। इनमें यातना की स्पष्ट और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप परिभाषा का अभाव, मानसिक पीड़ा को शामिल न करना, सजा के स्पष्ट प्रावधानों की कमी, और पीड़ितों के पुनर्वास व मुआवजे के लिए पर्याप्त व्यवस्था न होना शामिल है। रिपोर्ट में प्रक्रियागत कमजोरियों की भी ओर इशारा किया गया है, जैसे शिकायत दर्ज करने और जांच की स्पष्ट प्रणाली का अभाव, मेडिकल जांच के अंतरराष्ट्रीय मानकों से असंगति, और स्वतंत्र या स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) जांच की सीमित व्यवस्था।
कानूनी प्रावधान होने के बावजूद, कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर यातना के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में यह धारणा भी है कि अपराध से निपटने के लिए यातना एक प्रभावी तरीका है, खासकर तब जब पुलिस संसाधनों और उपकरणों की कमी से जूझ रही हो और न्यायालयों में मामलों का बोझ अधिक हो। इस बीच, पंजाब प्रांत के मुजफ्फरगढ़ की एक महिला स्वास्थ्यकर्मी द्वारा अपने दो बेटों की कथित पुलिस मुठभेड़ में मौत की स्वतंत्र जांच की मांग ने न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे में गिरावट को उजागर किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस द्वारा “एनकाउंटर” के नाम पर संदिग्धों को मारने की घटनाएं अब एक व्यवस्थित प्रवृत्ति का रूप लेती दिख रही हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल के महीनों में पंजाब में सैकड़ों पुलिस मुठभेड़ों में बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं। चिंताजनक बात यह है कि कुछ मामलों में राजनीतिक स्तर पर इन घटनाओं की सराहना भी की गई है, जिससे न्यायेतर तरीकों को अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता दिखता है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस तरह की प्रवृत्तियां न केवल न्याय प्रणाली की विफलता को दर्शाती हैं, बल्कि समाज में कानून और अव्यवस्था के बीच की रेखा को भी धुंधला करती हैं।
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