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80 साल बाद जापान का नया अवतार, एशिया में बढ़ेगी हलचल

Saba Naaz
27 July 2026 8:13 PM IST
80 साल बाद जापान का नया अवतार, एशिया में बढ़ेगी हलचल
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टोक्यो। जापान अपनी आठ दशक पुरानी रक्षा नीतियों में बड़ा बदलाव कर रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शांतिवादी छवि अपनाने वाला जापान अब धीरे-धीरे अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। रक्षा बजट बढ़ाने, हथियारों के निर्यात की अनुमति देने और सैन्य ताकत के इस्तेमाल को लेकर नियमों में बदलाव के बाद चीन समेत कई देशों की नजरें जापान की नई रणनीति पर टिक गई हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने अपनी सुरक्षा नीति को तीन प्रमुख सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया था। इनमें सैन्य शक्ति का सीमित इस्तेमाल, हथियारों के निर्यात पर रोक और रक्षा क्षेत्र में कम खर्च शामिल था। ये नीतियां केवल सरकारी फैसले नहीं थीं, बल्कि युद्ध की भयावह यादों के बाद जापान की नई पहचान का हिस्सा बन गई थीं।

1945 के बाद जापान ने खुद को एक शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में पेश किया। पड़ोसी देशों को भरोसा दिलाने के लिए टोक्यो ने सैन्य विस्तार से दूरी बनाए रखी और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बदलते वैश्विक हालात, चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और क्षेत्रीय तनावों के बीच जापान ने अपनी रणनीति में बदलाव शुरू कर दिया।

अब जापान रक्षा बजट बढ़ा रहा है और अपनी सेना यानी सेल्फ डिफेंस फोर्सेज की क्षमताओं को आधुनिक बना रहा है। इसके अलावा लंबी दूरी तक हमला करने वाली मिसाइलों, अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली और रक्षा तकनीक को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। जापान ने हथियारों के निर्यात को लेकर भी अपनी पुरानी नीति में बदलाव किया है, जिससे उसकी रक्षा इंडस्ट्री को विस्तार मिलने की संभावना है।

जापान के इस बदलाव को चीन गंभीरता से देख रहा है। बीजिंग का मानना है कि टोक्यो की नई रक्षा नीति केवल सुरक्षा सुधार नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत है। चीन के लिए जापान का सैन्य रूप से मजबूत होना कई रणनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।

चीन की पहली चिंता इतिहास से जुड़ी हुई है। 1890 के दशक से 1945 तक जापान के साम्राज्यवादी विस्तार और युद्धकालीन गतिविधियों की यादें आज भी चीन और कई अन्य एशियाई देशों में मौजूद हैं। बीजिंग अक्सर इन ऐतिहासिक घटनाओं का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रणनीति में करता रहा है। चीन का आरोप है कि जापान सैन्य विस्तार की दिशा में लौट रहा है, हालांकि टोक्यो इसे अपनी सुरक्षा जरूरतों से जोड़कर देखता है।

दूसरी बड़ी चिंता जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता है। जापान का रक्षा खर्च बढ़ाना, आधुनिक हथियारों का विकास और जवाबी हमले की क्षमता हासिल करना चीन के लिए रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है। खासकर ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जापान की भूमिका बढ़ने से चीन सतर्क है।

तीसरी वजह जापान के अंतरराष्ट्रीय गठबंधन हैं। जापान अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है और हाल के वर्षों में उसने दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ भी रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका के नेतृत्व वाले सहयोगी नेटवर्क में जापान की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

चीन को चिंता है कि भविष्य में किसी भी क्षेत्रीय संकट की स्थिति में उसे केवल जापान और अमेरिका का सामना नहीं करना पड़ेगा, बल्कि कई देशों के संयुक्त गठबंधन का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि बीजिंग जापान की बदलती रक्षा नीति को बेहद करीब से देख रहा है।

हालांकि जापान का कहना है कि उसकी नई रक्षा रणनीति किसी देश के खिलाफ आक्रामक कदम नहीं है, बल्कि बदलते सुरक्षा माहौल में अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने की जरूरत है। उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण, चीन की सैन्य गतिविधियां और क्षेत्रीय विवादों के कारण जापान अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जापान का यह बदलाव आने वाले वर्षों में एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित कर सकता है। 80 साल बाद जापान का सैन्य नीति में बदलाव केवल उसके लिए नहीं, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक बड़ा रणनीतिक परिवर्तन साबित हो सकता है।

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