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UNHRC में उठा PoGB कार्यकर्ताओं की हिरासत का मुद्दा जावेद बेग ने जताई चिंता
Ratna Netam
26 Sept 2026 4:51 PM IST

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जिनेवा। कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता जावेद अहमद बेग ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बाल्टिस्तान में राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की कथित हिरासत तथा उत्पीड़न का मुद्दा उठाया। उन्होंने UNHRC से इन मामलों पर तत्काल ध्यान देने की अपील करते हुए पाकिस्तान से आतंकवाद-रोधी कानूनों के कथित दुरुपयोग को रोकने की मांग की।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का 63वां नियमित सत्र जिनेवा में 7 सितंबर से 7 अक्टूबर 2026 तक आयोजित हो रहा है। इसमें विभिन्न देशों और क्षेत्रों से जुड़े मानवाधिकार मुद्दों पर चर्चा की जा रही है।बेग ने अपने संबोधन में गिलगित-बाल्टिस्तान की अवामी एक्शन कमेटी के चेयरमैन और वरिष्ठ अधिवक्ता एहसान अली के साथ नुसरत हुसैन, महबूब वली, नफीस और मेहर अली का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कार्यकर्ताओं को हिरासत और कानूनी प्रतिबंधों के जरिए परेशान किया गया।
बेग के अनुसार, इन कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून, Anti-Terrorism Act 1997 की Fourth Schedule यानी चौथी अनुसूची में रखा गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रावधान का इस्तेमाल आतंकवाद से निपटने के बजाय शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठाने वाले राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया जा रहा है।पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून की Fourth Schedule संदिग्ध व्यक्तियों की निगरानी और उन पर कुछ प्रतिबंध लगाने से जुड़ी व्यवस्था है। इसमें शामिल व्यक्तियों को अपनी गतिविधियों और आवाजाही से संबंधित कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है। बेग ने UNHRC के सामने दावा किया कि गिलगित-बाल्टिस्तान के कार्यकर्ताओं पर इस कानून का इस्तेमाल उनकी राजनीतिक और नागरिक गतिविधियों को सीमित करने के लिए किया गया।
उन्होंने अवामी एक्शन कमेटी को क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक समूहों को साथ लाने वाला संगठन बताया। बेग के अनुसार, संगठन स्थानीय लोगों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मांगों को उठाता रहा है।बेग ने विशेष रूप से एहसान अली का मामला उठाया। उन्होंने उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता बताते हुए दावा किया कि उन्हें और उनके सहयोगियों को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया। इससे पहले भी बेग ने आरोप लगाया था कि एहसान अली और अन्य कार्यकर्ताओं को करीब तीन महीने तक जेल में रखा गया और उन्हें जमानत मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने UNHRC से अपील की कि गिलगित-बाल्टिस्तान में कार्यकर्ताओं को कथित रूप से बार-बार हिरासत में लिए जाने के मामलों पर ध्यान दिया जाए। उनका कहना था कि राजनीतिक मतभेद या नागरिक मांगों को उठाने वाले लोगों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।बेग ने कहा कि मानवाधिकार परिषद जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मामलों पर नजर रखें, जहां नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े सवाल उठते हैं।
उन्होंने दावा किया कि गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय कार्यकर्ताओं को अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाने के कारण प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। बेग ने इसे मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस पर ध्यान देने की मांग की।बेग की ओर से लगाए गए आरोपों को उनके दावों के रूप में देखा जाना जरूरी है। इन विशिष्ट मामलों में पाकिस्तानी अधिकारियों का विस्तृत पक्ष उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में आरोपों को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
गिलगित-बाल्टिस्तान की राजनीतिक स्थिति लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का हिस्सा रही है। भारत पूरे पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर रियासत को अपना हिस्सा मानता है और गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान के प्रशासन को अवैध बताता है। दूसरी ओर, यह क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान के प्रशासन में है।हाल के वर्षों में गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय संगठनों की ओर से विभिन्न आर्थिक और नागरिक मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किए जाते रहे हैं। इनमें खाद्य वस्तुओं की कीमत, बिजली, कर व्यवस्था, भूमि और स्थानीय अधिकारों जैसे विषय शामिल रहे हैं। अवामी एक्शन कमेटी भी इनमें से कई स्थानीय मांगों को उठाती रही है।
बेग ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने वाले नागरिकों और संगठनों को अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आतंकवाद से निपटने के लिए बनाए गए कानूनी प्रावधानों को राजनीतिक असहमति या शांतिपूर्ण आंदोलन से जोड़ना नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रभावित करता है।उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से ऐसे मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने और प्रभावित कार्यकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाने का आग्रह किया। बेग ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को कानूनी प्रक्रिया, निष्पक्ष सुनवाई और अपने बचाव का अवसर मिलना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद दुनिया भर में मानवाधिकारों की स्थिति पर चर्चा करने और संबंधित देशों से जवाब मांगने के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मंचों में से एक है। इसके नियमित सत्रों में सदस्य देशों के साथ मानवाधिकार विशेषज्ञ, नागरिक समाज संगठन और अन्य प्रतिनिधि विभिन्न मुद्दे उठाते हैं।बेग की ओर से गिलगित-बाल्टिस्तान के कार्यकर्ताओं का मामला उठाए जाने के बाद क्षेत्र में आतंकवाद-रोधी कानूनों के इस्तेमाल और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े सवाल एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने आए हैं।
उन्होंने UNHRC से आग्रह किया कि गिलगित-बाल्टिस्तान में कार्यकर्ताओं की हिरासत और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई से जुड़े मामलों पर निगरानी रखी जाए। साथ ही पाकिस्तान से आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप करने की मांग की।फिलहाल बेग की ओर से लगाए गए आरोपों पर संबंधित पाकिस्तानी अधिकारियों की प्रतिक्रिया सामने आना महत्वपूर्ण होगा। उनके आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर ही इन मामलों की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी। UNHRC में उठाया गया यह मामला गिलगित-बाल्टिस्तान में नागरिक अधिकारों और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर जारी बहस का हिस्सा बन गया है।
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