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जिनेवा में उठा बांग्लादेश के संवैधानिक संकट का मुद्दा

Ratna Netam
3 Oct 2026 4:00 PM IST
जिनेवा में उठा बांग्लादेश के संवैधानिक संकट का मुद्दा
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जिनेवा।संयुक्त राष्ट्र के चल रहे 63वें मानवाधिकार सत्र के दौरान जिनेवा में बांग्लादेश की राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं सामने रखी गईं। “Constitutional Crisis in Bangladesh” विषय पर आयोजित एक सेमिनार में वक्ताओं ने देश में राजनीतिक गतिविधियों, विपक्ष की स्थिति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। यह कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सत्र के समानांतर आयोजित किया गया था।
सेमिनार में साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम (SADF) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पाउलो कासाका ने बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में वर्तमान शासन की संवैधानिक वैधता को लेकर सवाल हैं और राजनीतिक विपक्ष पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं। ये कासाका द्वारा सेमिनार में किए गए दावे हैं; इन्हें स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कासाका ने बांग्लादेश की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी पर लगी पाबंदी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने पत्रकारों और अन्य लोगों के कथित उत्पीड़न तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध को लेकर चिंता जताई। उनका आरोप था कि देश के शिक्षा क्षेत्र में भी व्यापक स्तर पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।
बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि 2024 के घटनाक्रम से जुड़ी है। बड़े पैमाने पर हुए छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना सत्ता से बाहर हो गई थीं। इसके बाद अगस्त 2024 में मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम प्रशासन के मुख्य सलाहकार के रूप में शपथ ली। इस बदलाव के बाद देश में संवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक संक्रमण को लेकर लगातार बहस होती रही है। इंटरनेशनल IDEA भी बांग्लादेश की स्थिति को जारी संवैधानिक संक्रमण और सुधार प्रक्रिया के संदर्भ में देखता है।
जिनेवा के सेमिनार में कासाका ने राजनीतिक संकट के साथ आर्थिक परिस्थितियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि राजनीतिक अस्थिरता के साथ सरकार के सामने आर्थिक दायित्वों को पूरा करने की चुनौती भी मौजूद है। सेमिनार में उनके वक्तव्य का मुख्य जोर लोकतांत्रिक राजनीतिक गतिविधियों के लिए जगह, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक प्रक्रिया पर रहा।
कार्यक्रम में बांग्लादेशी मानवाधिकार कार्यकर्ता रहमान खलीलुर मामून ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि विभिन्न देशों के वक्ताओं और पैनलिस्टों ने सेमिनार में भाग लिया और बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर अपनी चिंताएं रखीं। मामून ने 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता से जुड़ी राजनीतिक पार्टी की मौजूदा स्थिति का उल्लेख करते हुए उस पर लगाए गए प्रतिबंध को अलोकतांत्रिक बताया। यह उनका राजनीतिक आकलन था।
मामून ने कहा कि देश में लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी से जुड़े सवालों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ध्यान देना चाहिए। सेमिनार में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की ऑनलाइन भागीदारी का भी उल्लेख किया गया। मामून के मुताबिक, हसीना ने कार्यक्रम में ऑनलाइन संबोधन के जरिए बांग्लादेश के लोगों के प्रति एकजुटता व्यक्त की। कार्यक्रम से संबंधित सार्वजनिक सामग्री में भी हसीना को मुख्य वक्ता और पाउलो कासाका सहित कई लोगों को पैनल वक्ताओं के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।
कासाका ने शेख हसीना की बांग्लादेश लौटने की कथित योजना का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे देश की मौजूदा संवैधानिक प्रक्रिया के संदर्भ में उम्मीद से जोड़कर देखा और कहा कि उनकी वापसी राजनीतिक गतिरोध को प्रभावित कर सकती है। यह कासाका का अपना आकलन था और बांग्लादेश की विभिन्न राजनीतिक धाराओं के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं।
बांग्लादेश में संवैधानिक सुधार का मुद्दा पिछले दो वर्षों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। इंटरनेशनल IDEA के अनुसार, 2024 के विरोध प्रदर्शनों और सत्ता परिवर्तन के बाद संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन राजनीतिक संक्रमण का अंतिम स्वरूप अभी भी महत्वपूर्ण बहस का विषय बना हुआ है।
जिनेवा में हुई चर्चा में मानवाधिकार और संवैधानिक व्यवस्था के साथ शिक्षा, हिरासत और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े विषय भी सामने आए। कार्यक्रम की सार्वजनिक घोषणा में शिक्षा के अधिकार, मनमानी हिरासत और ट्रिब्यूनल के फैसलों से संबंधित मुद्दों को भी चर्चा के एजेंडे में शामिल किया गया था।
सेमिनार में लगाए गए आरोपों और राजनीतिक दावों को लेकर बांग्लादेश के मौजूदा प्रशासन का पक्ष उपलब्ध रिपोर्ट में विस्तार से शामिल नहीं था। ऐसे में कार्यक्रम में व्यक्त विचारों को संबंधित वक्ताओं के आरोप और आकलन के रूप में देखना महत्वपूर्ण है।
कुल मिलाकर जिनेवा का यह सेमिनार बांग्लादेश में जारी राजनीतिक संक्रमण को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चल रही चर्चा का हिस्सा रहा। इसमें वक्ताओं ने संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक भागीदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार से जुड़े सवाल उठाए तथा देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर अपनी-अपनी चिंताएं सामने रखीं।
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