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नेपाल की संसद में गूंजा भारत का नाम पीएम बालेन शाह ने की मदद की सराहना
Ratna Netam
2 Sept 2026 8:47 PM IST

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काठमांडू। विनाशकारी बाढ़ और फ्लैश फ्लड से जूझ रहे नेपाल के प्रधानमंत्री **बालेन्द्र 'बालेन' शाह** ने संकट की घड़ी में मदद के लिए भारत का सार्वजनिक रूप से आभार जताया है। बुधवार को नेपाल की प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए शाह ने साफ कहा कि इतनी बड़ी आपदा के दौरान अंतरराष्ट्रीय सहयोग लेने से इनकार करने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने भारत और चीन की ओर से शुरुआती दौर में भेजे गए तकनीकी विशेषज्ञों और राहत सहायता का जिक्र करते हुए दोनों पड़ोसी देशों को धन्यवाद दिया।
नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई है। बुधवार तक नेपाल में मृतकों की संख्या **1,127** तक पहुंच गई थी, जबकि करीब 4,900 लोग अब भी लापता बताए जा रहे थे। खराब मौसम, भारी मलबा और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में पानी भरने के कारण राहत एवं तलाश अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
संसद में भारत और चीन का जताया आभार
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में सरकार के आपदा प्रबंधन को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि नेपाल ने शुरुआत से ही जरूरत के अनुसार अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए मित्र देशों के साथ समन्वय किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इतनी बड़ी त्रासदी के समय विदेशी सहायता न लेने जैसी कोई बात नहीं थी। शाह ने बताया कि भारत और चीन ने तकनीकी विशेषज्ञ भेजे, जिन्होंने प्रभावित इलाकों में नुकसान का आकलन करने और वहां तक पहुंचने की संभावनाओं को समझने में नेपाल की मदद की।
उनके मुताबिक शुरुआती चरण में हवाई सर्वेक्षण समेत कई माध्यमों से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का पता लगाया गया।
शाह ने विशेष रूप से भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों के दूरदराज के प्रभावित इलाकों तक पहुंचने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जमीनी परिस्थितियां इतनी कठिन थीं कि कई स्थानों पर भारी मशीनों के साथ नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों के लिए भी काम करना मुश्किल था।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग नहीं लेने का सवाल ही नहीं'
संसद में शाह का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल सरकार से पूछा जा रहा था कि क्या उसने शुरुआती दौर में विदेशी सहायता लेने में हिचकिचाहट दिखाई थी।
शाह ने इस धारणा को खारिज करते हुए कहा कि इतनी बड़ी आपदा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग नहीं लेने का सवाल ही नहीं उठता। उनके मुताबिक प्रभावित क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुसार नेपाल ने शुरुआत से ही दूसरे देशों के साथ समन्वय किया था।
नेपाल के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भारत के अलावा पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और ब्रिटेन समेत कई देशों से मिली सहायता का उल्लेख किया।
एशियाई विकास बैंक, विश्व बैंक, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी नेपाल को सहयोग का भरोसा दिया है।
भारत ने शुरुआत से दिया मदद का भरोसा
नेपाल में आपदा की गंभीरता सामने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालेन शाह से फोन पर बात की थी।
भारत सरकार के मुताबिक पीएम मोदी ने नेपाल में हुई जनहानि पर संवेदना व्यक्त करते हुए कहा था कि इस कठिन समय में भारत के लोग नेपाल के लोगों के साथ खड़े हैं। उन्होंने नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता देने की प्रतिबद्धता भी दोहराई थी।
इसके बाद भारत ने राहत एवं बचाव कार्यों के लिए नेपाल के साथ समन्वय तेज किया।
नेपाल भौगोलिक रूप से भारत का बेहद करीबी पड़ोसी है और दोनों देशों के बीच खुली सीमा, व्यापार, सांस्कृतिक संबंध तथा लोगों के बीच गहरे संपर्क हैं। इसलिए बड़े भूकंप, बाढ़ या दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान दोनों देशों के बीच मानवीय सहयोग पहले भी देखने को मिलता रहा है।
भारत ने भेजी 68 टन से ज्यादा राहत सामग्री
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक भारत की ओर से नेपाल के लिए अब तक **68 टन से अधिक राहत सामग्री** और विशेष बचाव सहायता भेजी जा चुकी है। इसमें कंबल, स्लीपिंग बैग, तिरपाल, प्लास्टिक शीट, हाइजीन किट, खाद्य सामग्री, सोलर लैंप, पानी शुद्ध करने की गोलियां और पोर्टेबल जनरेटर जैसी जरूरी वस्तुएं शामिल हैं।
2 सितंबर को भारत की ओर से नेपाल के लिए पांचवीं राहत खेप भी रवाना की गई।
रिपोर्टों के अनुसार इस खेप में **11 सदस्यीय बचाव दल, विशेष उपकरण और करीब 5.5 टन आवश्यक दवाइयां** शामिल थीं।
इससे पहले भी भारतीय वायुसेना के विमानों और दूसरे माध्यमों से राहत सामग्री नेपाल पहुंचाई गई थी।
भारत की तकनीकी और विशेषज्ञ टीमें नेपाली अधिकारियों के साथ मिलकर प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्यों में सहयोग कर रही हैं।
पहले दिन क्या हुआ था, शाह ने संसद में बताया
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में आपदा के शुरुआती घंटों का पूरा घटनाक्रम भी बताया।
उन्होंने कहा कि जैसे ही सरकार को रसुवा के भोटेकोशी क्षेत्र में भीषण बाढ़ की जानकारी मिली, अधिकारियों और सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया।
सरकार ने प्रभावित स्थानीय निकायों को संकटग्रस्त क्षेत्र घोषित करने, मृतकों के परिवारों को सहायता उपलब्ध कराने, घायलों और फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने तथा नेपाली सेना और निजी क्षेत्र के हेलीकॉप्टरों को राहत कार्य में लगाने जैसे निर्णय किए।
शाह ने कहा कि प्रभावित लोगों के लिए इलाज, भोजन, रहने की व्यवस्था और बिजली, दूरसंचार, सड़क तथा पेयजल जैसी जरूरी सेवाओं को बहाल करना प्राथमिकताओं में शामिल किया गया।
आधी रात को भेजे गए राहत के ट्रक
शाह ने बताया कि आपदा वाले दिन आधी रात तक प्रभावित इलाकों के लिए राहत सामग्री से भरे ट्रक रवाना कर दिए गए थे।
इसके साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए वॉयस, डेटा और एसएमएस जैसी सेवाएं मुफ्त करने की व्यवस्था भी की गई।
अगले दिन शाह खुद भी एक सरकारी टीम के साथ प्रभावित इलाके में पहुंचे और जमीनी हालात का जायजा लिया।
सरकार ने रसुवा और नुवाकोट के लिए एक-एक करोड़ नेपाली रुपये तथा धादिंग के लिए 50 लाख नेपाली रुपये जारी करने का फैसला किया। विदेशी नागरिकों की खोज, बचाव और कांसुलर सहायता के लिए भी विशेष टीम गठित की गई।
करीब 12 हजार लोगों को बचाने का दावा
प्रधानमंत्री शाह ने संसद में कहा कि राहत एवं बचाव अभियान के दौरान **11,993 लोगों को बचाया गया है**, जबकि उनके संबोधन के समय 3,916 लोगों के लापता होने की जानकारी थी। अलग-अलग समय पर अपडेट होने वाले आधिकारिक आंकड़ों के कारण लापता लोगों की संख्या में बाद में बदलाव हुआ है।
महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को बचाव अभियान में प्राथमिकता दिए जाने की बात भी कही गई।
नेपाल सरकार ने विदेशी नागरिकों की तलाश और उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए भी अलग व्यवस्था की है।
जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगें बनी बड़ी चुनौती
बाढ़ के बाद सबसे कठिन अभियानों में जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में लापता लोगों की तलाश शामिल है।
नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक बारिश का पानी सुरंगों में भर गया है। इससे अंदर जाकर तलाशी लेना बेहद कठिन हो गया है।
नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल, विदेशी तकनीकी विशेषज्ञ और परियोजनाओं के कर्मचारी मिलकर इन इलाकों में अभियान चला रहे हैं।
मलबा इतनी बड़ी मात्रा में जमा हुआ है कि कुछ जगह सुरंगों के प्रवेश द्वार का सटीक स्थान पता करना भी चुनौती बन गया है।
यही वजह है कि नेपाल को विशेष तकनीकी विशेषज्ञता और उपकरणों की आवश्यकता पड़ रही है।
बाढ़ से 400 मेगावाट बिजली क्षमता प्रभावित
इस आपदा ने केवल जान-माल का नुकसान नहीं किया बल्कि नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी बड़ा झटका दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक बाढ़ के कारण करीब **400 मेगावाट जलविद्युत क्षमता** प्रभावित हुई है।
रसुवा और नुवाकोट क्षेत्र में करीब 40 किलोमीटर पक्की सड़क पूरी तरह नष्ट हुई, जबकि लगभग 16 किलोमीटर सड़क आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुई है। इसके अलावा **42 सस्पेंशन ब्रिज और 31 मोटरेबल ब्रिज** को भी नुकसान पहुंचा है।
इतने बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के नुकसान के कारण राहत सामग्री पहुंचाना और प्रभावित गांवों तक भारी मशीनरी ले जाना भी मुश्किल हो रहा है।
मृतकों की पहचान भी बड़ी चुनौती
नेपाल पुलिस के मुताबिक बुधवार तक बाढ़ से मरने वालों की संख्या 1,127 तक पहुंच गई थी।
इनमें से **1,113 शवों का पोस्टमार्टम और कानूनी पहचान संबंधी प्रक्रिया पूरी** की जा चुकी थी, लेकिन बड़ी संख्या में शवों की पहचान अभी बाकी थी।
पुलिस ने 911 अज्ञात शवों का विवरण अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया ताकि लापता लोगों के परिवार पहचान में मदद कर सकें।
कई शव बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के कारण पहचान में मुश्किल आ रही है। ऐसे मामलों में DNA जांच की मदद ली जा रही है।
जलवायु परिवर्तन का मुद्दा भी उठाया
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में इस आपदा को जलवायु परिवर्तन से भी जोड़ा।
उन्होंने विशेषज्ञों का हवाला देते हुए कहा कि रसुवा जिले के भोटेकोशी क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ हिमालय में हुए **आइस-रॉक एवलांच** से जुड़ी थी। उनके मुताबिक यह घटना बताती है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने खतरा किस तरह बढ़ रहा है।
शाह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन में वैश्विक योगदान है, इसलिए उसके प्रभावों को कम करने और उनसे निपटने की जिम्मेदारी भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की है।
नेपाल सरकार इस आपदा को वैश्विक मंचों पर हिमालयी देशों की जलवायु संवेदनशीलता के उदाहरण के तौर पर उठाने की तैयारी में है।
राहत और 'क्लाइमेट कम्पेनसेशन' की बहस
बालेन शाह का भारत और चीन को धन्यवाद देने वाला बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल सरकार के एक मंत्री की ओर से जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में बड़े देशों से **'क्लाइमेट कम्पेनसेशन'** की मांग की चर्चा भी चल रही है।
इसे तत्काल आपदा सहायता से अलग संदर्भ में समझना जरूरी है। नेपाल एक तरफ वर्तमान संकट में भारत, चीन और अन्य देशों से मिल रही मानवीय सहायता को स्वीकार कर उसका आभार जता रहा है, वहीं दूसरी तरफ लंबे समय के लिए जलवायु न्याय और हिमालयी देशों की संवेदनशीलता का मुद्दा उठा रहा है।
इसलिए दोनों बातों को एक-दूसरे के विरोधाभास के रूप में देखना जरूरी नहीं है।
भारत-नेपाल संबंधों के लिए अहम संदेश
नेपाल के प्रधानमंत्री की ओर से संसद में भारत को सार्वजनिक रूप से धन्यवाद देना दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
भारत ने आपदा के तुरंत बाद नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया और इसके बाद राहत सामग्री, दवाइयां, विशेषज्ञ तथा बचाव दल भेजे। नेपाल सरकार ने भी इस मदद की भूमिका को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है।
फिलहाल नेपाल की प्राथमिकता लापता लोगों को तलाशना, प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाना और नष्ट हुए बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना है। हजारों लोग अभी भी लापता हैं और कई प्रभावित इलाकों तक पहुंचना मुश्किल बना हुआ है।
ऐसे हालात में बालेन शाह का यह कहना कि **इतनी बड़ी आपदा में अंतरराष्ट्रीय मदद लेने से इनकार करने का सवाल ही नहीं उठता**, नेपाल की मौजूदा रणनीति को स्पष्ट करता है। पड़ोसी भारत की ओर से राहत सामग्री और विशेषज्ञ सहायता जारी है, जबकि नेपाल अब तत्काल बचाव के साथ पुनर्वास और पुनर्निर्माण की लंबी चुनौती की तरफ बढ़ रहा है।
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