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BIJING बीजिंग। चीन की राजधानी पेइचिंग में शनिवार को भारतीय दूतावास का परिसर हिंदी की आवाज़ों, मुस्कुराहटों और आत्मीय संवाद से भर उठा। मौका था विश्व हिंदी दिवस का, जो हर साल 10 जनवरी को मनाया जाता है। हालांकि विश्वविद्यालयों में अवकाश को देखते हुए यह आयोजन एक सप्ताह पहले रखा गया, लेकिन उत्साह और भावनाओं में कोई कमी नहीं दिखी।
इस आयोजन में पेकिंग विश्वविद्यालय, पेइचिंग विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय, और छिंग्हुवा विश्वविद्यालय सहित कई प्रमुख संस्थानों से हिंदी पढ़ने वाले चीनी छात्र, हिंदी पढ़ाने वाले भारतीय और चीनी शिक्षक, तथा भारत-चीन संबंधों के अध्ययनकर्ता बड़ी संख्या में मौजूद रहे। दूतावास का सभागार उस दृश्य का साक्षी बना, जहाँ हिंदी किताबों से निकलकर ज़िंदगियों में उतरती दिखाई दी।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारत के राजदूत प्रदीप रावत ने कहा कि इस गरिमामय अवसर पर हिंदी की उस जीवंत चेतना का उत्सव मनाया जा रहा है, जिसकी गूंज आज दुनिया के हर कोने में सुनाई देती है। उन्होंने कहा कि हिंदी अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक वैश्विक संवाद-सेतु बन चुकी है। जब कोई भाषा अपनी भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़कर सम्मान और अपनापन पाती है, तो यह उसकी सांस्कृतिक शक्ति और सार्वभौमिक अपील का प्रमाण होता है।
राजदूत ने हिंदी की सरलता, समावेशिता और भावनात्मक अभिव्यक्ति की ताकत पर बात करते हुए कहा कि यही गुण इसे सीखने और अपनाने योग्य बनाते हैं। हिंदी केवल शब्दों का माध्यम नहीं है, बल्कि दिलों को जोड़ने की भाषा है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि चीन में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता भारत-चीन के ऐतिहासिक संबंधों को नई गहराई दे रही है। आज चीन में हिंदी का अध्ययन सिर्फ एक अकादमिक विषय नहीं, बल्कि भारत को उसकी संस्कृति, साहित्य, दर्शन, सिनेमा और समाज के साथ समझने का सशक्त माध्यम बन चुका है।
उन्होंने हिंदी शिक्षकों और विद्वानों की भूमिका को अहम बताते हुए कहा कि किसी भी भाषा का विस्तार उन्हीं के कंधों पर टिका होता है। ये शिक्षक केवल व्याकरण नहीं पढ़ाते, बल्कि दो संस्कृतियों के बीच सेतु बनते हैं। इसी क्रम में उन्होंने चीन में भारत अध्ययन से जुड़े विद्वानों, विशेष रूप से प्रोफेसर च्यांग चिनखुई के योगदान की सराहना की और इसे भारत-चीन शैक्षणिक संवाद की मजबूत नींव बताया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छिंग्हुवा विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड एरिया स्टडीज़ के प्रोफेसर और डायरेक्टर प्रो. च्यांग चिनखुई ने अपने संबोधन में हिंदी को एक भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी उनके लिए सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि “घर जैसी और परिवार जैसी” है। उनके शब्दों में, हिंदी में बोलना भारत के बारे में बोलने और भारत से प्रेम करने जैसा है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के कई देशों में जाने के बावजूद, उन्हें भारत में ही घर जैसा एहसास होता है।
प्रो. च्यांग ने बताया कि उनका सपना है कि वे अपने छात्रों को भारत ले जाएं, ताकि वे सिर्फ पर्यटन न करें, बल्कि भारत को महसूस करें, उसे समझें और छू सकें। वेदों, पुराणों और महाकाव्यों जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन के ज़रिये वे दोनों सभ्यताओं के बीच के गहरे संबंधों को तलाशना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं रही, बल्कि चीन में उनके “हिंदी परिवार” के लिए यह अपनी भाषा बन चुकी है। उनके लिए हर दिन हिंदी दिवस है।
कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने माहौल को और जीवंत बना दिया। अलग-अलग विश्वविद्यालयों के चीनी छात्रों ने हिंदी गीत गाकर सबका दिल जीत लिया। वहीं चीनी इंटरनेट इन्फ्लुएंसर मीरा और अंजलि की हंसी-मजाक से भरी ‘जुगलबंदी’ ने सभागार को ठहाकों से गूंजा दिया।
समापन सत्र में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित कविता, लेख लेखन और वीडियो प्रतियोगिता के विजेताओं के नामों की घोषणा की गई। राजदूत प्रदीप रावत और प्रो. च्यांग चिनखुई ने विजेताओं को उपहार देकर सम्मानित किया।
यह आयोजन साफ़ तौर पर यह संदेश दे गया कि भाषा सिर्फ संवाद का साधन नहीं होती, बल्कि वह रिश्तों की नींव रखती है। हिंदी के माध्यम से भारत और चीन के बीच जो सांस्कृतिक और मानवीय संवाद पनप रहा है, वह आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंधों को और आत्मीय, और मजबूत बनाने की क्षमता रखता है।
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