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संयुक्त राष्ट्र के वित्तीय संकट पर भारत ने जताई चिंता, एक देश पर 90 फीसदी बकाया

Kavita2
20 Oct 2026 11:08 AM IST
संयुक्त राष्ट्र के वित्तीय संकट पर भारत ने जताई चिंता, एक देश पर 90 फीसदी बकाया
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न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र की लगातार बिगड़ती वित्तीय स्थिति को लेकर भारत ने गंभीर चिंता जताई है। भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठन को आर्थिक संकट से बचाने के लिए सभी सदस्य देशों को अपना निर्धारित अंशदान समय पर और पूरी राशि के साथ जमा करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के काउंसलर सुरेंद्र अढाना ने सोमवार, 19 अक्टूबर को संगठन की वित्तीय स्थिति पर चर्चा के दौरान कहा कि वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र की नकदी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। उन्होंने इस बात पर विशेष चिंता जताई कि नियमित बजट की बकाया राशि का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल एक सदस्य देश से संबंधित है। भारत ने स्पष्ट किया कि इतनी बड़ी राशि का भुगतान लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है और इससे संयुक्त राष्ट्र के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भारत की चिंता

सुरेंद्र अढाना ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की पांचवीं समिति में वित्तीय स्थिति से संबंधित चर्चा के दौरान भारत का पक्ष रखा।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 में संगठन की नकदी स्थिति कठिन बनी हुई है। सदस्य देशों से अंशदान प्राप्त होने में अनिश्चितता और नकदी की कम उपलब्धता इसके प्रमुख कारण हैं।

अढाना ने बताया कि वर्ष की तीसरी तिमाही में सदस्य देशों से अपेक्षाकृत बेहतर भुगतान प्राप्त होने के कारण स्थिति में कुछ सुधार हुआ है।

हालांकि उन्होंने आगाह किया कि यह सुधार तभी टिकाऊ होगा, जब सदस्य देश नियमित रूप से अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी करेंगे।

भारत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रभावी संचालन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध होना जरूरी है।

सदस्य देशों को समय पर भुगतान की नसीहत

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को गंभीरता से लेने का आह्वान किया है।

सुरेंद्र अढाना ने कहा, "हमारा मानना है कि निर्धारित अंशदान का पूरा, समय पर और बिना किसी शर्त के भुगतान करना संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत हर सदस्य देश का दायित्व है।"

उन्होंने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियां सदस्य देशों के आर्थिक सहयोग पर निर्भर करती हैं।

यदि देश निर्धारित समय पर भुगतान नहीं करते, तो संगठन को विभिन्न कार्यक्रमों के संचालन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना को मजबूत बनाने के लिए वित्तीय प्रतिबद्धताओं का पालन आवश्यक है।

एक देश पर बकाया है 90 प्रतिशत से अधिक राशि

संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय स्थिति से जुड़ा सबसे चिंताजनक तथ्य नियमित बजट के बकाया भुगतान का है।

अढाना ने बताया कि नियमित बजट के अंतर्गत सदस्य देशों से प्राप्त होने वाली बकाया राशि 1.46 अरब अमेरिकी डॉलर है।

पिछले वर्ष यह राशि 1.87 अरब डॉलर थी। इस प्रकार बकाया राशि में कमी जरूर आई है, लेकिन यह अब भी काफी अधिक है।

भारतीय प्रतिनिधि ने बताया कि नियमित बजट की कुल बकाया राशि का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल एक सदस्य देश पर बकाया है।

हालांकि अपने बयान में उन्होंने उस देश का नाम नहीं लिया।

भारत ने इतनी बड़ी राशि लंबित रहने को अस्वीकार्य बताया और संबंधित वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

141 देशों ने पूरा किया भुगतान

भारत ने समय पर अंशदान जमा करने वाले देशों की संख्या बढ़ने का स्वागत किया।

अढाना ने बताया कि 30 सितंबर 2026 तक संयुक्त राष्ट्र के 141 सदस्य देशों ने अपना निर्धारित योगदान पूरी तरह जमा कर दिया था।

पिछले वर्ष इसी अवधि तक 136 देशों ने भुगतान किया था।

इस प्रकार एक वर्ष में पूर्ण भुगतान करने वाले देशों की संख्या पांच बढ़ी है।

भारत ने इसे सकारात्मक संकेत बताया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि सभी देशों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

शांति अभियानों पर भी बढ़ा वित्तीय दबाव

संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों की वित्तीय स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है।

भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, शांति अभियानों से संबंधित बकाया अंशदान पिछले वर्ष के 3.7 अरब डॉलर से बढ़कर 4.1 अरब डॉलर हो गया है।

इस दौरान प्राप्त भुगतान लगभग 1.4 अरब डॉलर के आसपास ही बना रहा।

अढाना ने बताया कि शांति अभियानों की कुल बकाया राशि का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा केवल दो सदस्य देशों पर बकाया है।

यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों की वित्तीय व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।

भारत ने समय पर भुगतान करने का दिया उदाहरण

सुरेंद्र अढाना ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को लगातार पूरा करता रहा है।

उन्होंने बताया कि भारत ने निर्धारित अंशदान हमेशा पूरी राशि में और समय पर जमा किया है। कई अवसरों पर भारत ने तय समयसीमा से पहले भी भुगतान किया है।

भारत की इस प्रतिबद्धता को संयुक्त राष्ट्र की ओर से मान्यता मिलती रही है।

इससे पहले 5 अक्टूबर को भी भारत ने महासभा की पांचवीं समिति में कहा था कि 30 सितंबर तक संयुक्त राष्ट्र का कुल बकाया बढ़कर 5.6 अरब डॉलर पहुंच गया है।

भारत ने स्पष्ट किया था कि वित्तीय संसाधनों के अभाव में संयुक्त राष्ट्र की सुधार योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन मुश्किल होगा।

विकासशील देशों को भुगतान में देरी पर चिंता

भारत ने शांति अभियानों में योगदान देने वाले देशों के लंबित भुगतान का मुद्दा भी उठाया है।

संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में कई विकासशील देश अपने सैनिक और पुलिसकर्मी भेजते हैं।

इन देशों को सैनिकों, उपकरणों और अन्य सेवाओं के लिए निर्धारित व्यवस्था के अनुसार भुगतान किया जाता है।

लेकिन सदस्य देशों से समय पर धनराशि प्राप्त नहीं होने के कारण भुगतान में देरी की समस्या पैदा हो सकती है।

भारत का कहना है कि शांति अभियानों में योगदान देने वाले देशों के वित्तीय हितों की रक्षा करना भी आवश्यक है।

वित्तीय संकट से प्रभावित हो सकते हैं कार्यक्रम

संयुक्त राष्ट्र दुनिया के विभिन्न हिस्सों में शांति स्थापना, मानवीय सहायता, विकास और मानवाधिकारों से जुड़े कार्यक्रम संचालित करता है।

इन गतिविधियों के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।

संगठन पहले भी चेतावनी दे चुका है कि बकाया अंशदान अधिक रहने से कार्यक्रमों के संचालन और आवश्यक खर्चों को पूरा करने में कठिनाई बढ़ सकती है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने वित्तीय सुधारों के साथ सदस्य देशों से निर्धारित भुगतान समय पर करने का आग्रह किया है।

भारत ने सामूहिक जिम्मेदारी पर दिया जोर

भारत ने स्पष्ट किया है कि संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना सभी सदस्य देशों की साझा जिम्मेदारी है।

संगठन को प्रभावी बनाए रखने के लिए केवल सुधार योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके संचालन के लिए आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध होने चाहिए।

भारत ने सदस्य देशों से अपील की कि वे भुगतान में अनावश्यक देरी न करें और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करें।

संयुक्त राष्ट्र में भारत का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब नियमित बजट और शांति अभियानों से संबंधित अरबों डॉलर का भुगतान लंबित है। अब संगठन की वित्तीय स्थिति में सुधार इस बात पर निर्भर करेगा कि बकाया रखने वाले सदस्य देश अपनी जिम्मेदारियां कितनी जल्दी पूरी करते हैं।

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