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Islamabad इस्लामाबाद: पाकिस्तान में पत्रकारों के लिए हाल के वर्षों में काम करना लगातार जोखिम भरा होता जा रहा है। ऑनलाइन रिपोर्टिंग को लेकर प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पेसा) के तहत कार्रवाई, सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों और निजी व्यक्तियों द्वारा आपराधिक मानहानि के मुकदमे, तथा सुरक्षा एजेंसियों का दबाव- इन सबने प्रेस की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। एक रिपोर्ट में यह खुलासा शनिवार को किया गया।
‘जर्नलिज़्म पाकिस्तान’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों, राजनीतिक आंदोलनों और संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दों को कवर करने वाले पत्रकारों को उत्पीड़न से लेकर शारीरिक हिंसा तक का सामना करना पड़ रहा है। प्रेस क्लबों और पत्रकार यूनियनों ने कई ऐसे मामलों को दर्ज किया है, जिनमें रिपोर्टरों पर हमले हुए या उन्हें सुरक्षा अभियानों के दौरान कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन घटनाओं के बाद अक्सर पारदर्शी जांच नहीं होती, जिससे दंडहीनता की भावना और मजबूत होती है।
महिला पत्रकारों को अतिरिक्त स्तर के उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, खासकर ऑनलाइन। रिपोर्ट के मुताबिक, समन्वित ट्रोलिंग, धमकियां और उनकी पेशेवर साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें आम हैं, विशेष रूप से राजनीति, मानवाधिकार या धार्मिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकारों के लिए। हालांकि डिजिटल उत्पीड़न एक वैश्विक समस्या है, लेकिन पाकिस्तान में ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल इसे और बढ़ा देता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में प्रेस स्वतंत्रता एक ऐसे प्रतिबंधात्मक माहौल में काम कर रही है, जहां कानूनी नियंत्रण, सुरक्षा दबाव, आर्थिक दबाव और डिजिटल पाबंदियां हावी हैं। वर्ष 2026 में भी देशभर के पत्रकार ऐसे वातावरण में काम कर रहे हैं, जहां संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से शक्तिशाली संस्थानों, राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक मामलों पर रिपोर्टिंग को सीमित करने वाले कानून और तौर-तरीके मौजूद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मानहानि कानून, आतंकवाद निरोधक प्रावधान, ईशनिंदा कानून और साइबर अपराध से जुड़े नियमों सहित एक व्यापक कानूनी ढांचा है, जिसका इस्तेमाल पत्रकारिता के खिलाफ किया जा सकता है।
कानूनी, सुरक्षा और आर्थिक दबावों के चलते समाचार कक्षों में आत्म-सेंसरशिप एक आम चलन बन चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि संपादक अक्सर किसी खबर के सार्वजनिक हित और उसे प्रकाशित करने से जुड़े संभावित जोखिमों के बीच संतुलन बनाते हैं। कई बार भाषा को नरम करना, नाम हटाना या खबर को टाल देना जोखिम प्रबंधन के रूप में देखा जाता है।
रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह का माहौल सार्वजनिक विमर्श पर दीर्घकालिक असर डालता है। जब संवेदनशील मुद्दों पर सीमित या सतर्क कवरेज होती है, तो लोग अप्रमाणित स्रोतों या सोशल मीडिया अटकलों की ओर रुख करते हैं। पत्रकारों का मानना है कि लगातार आत्म-सेंसरशिप से पेशेवर मीडिया पर भरोसा कमजोर होता है और तथ्य-आधारित बहस की गुंजाइश घटती है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति समान नहीं है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध के कुछ हिस्सों में काम करने वाले पत्रकारों को बड़े शहरी केंद्रों की तुलना में कहीं अधिक खतरे झेलने पड़ते हैं। इसके पीछे कानूनी सहायता की कमी, सीमित मीडिया संस्थान और कड़े सुरक्षा अभियान प्रमुख कारण बताए गए हैं।
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