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ईमान मजारी और हादी अली चठा को 10 साल की जेल, फैसले पर उठे गंभीर सवाल

Ratna Netam
30 Oct 2026 3:00 PM IST
ईमान मजारी और हादी अली चठा को 10 साल की जेल, फैसले पर उठे गंभीर सवाल
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इस्लामाबाद। पाकिस्तान में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय अधिवक्ता ईमान जैनब मजारी और उनके पति एवं मानवाधिकार वकील हादी अली चठा को 10-10 साल की जेल की सजा सुनाए जाने के बाद विवाद गहरा गया है। मानवाधिकार संगठन 'बलूच वॉयस फॉर जस्टिस' ने इस फैसले की निंदा की है। दोनों वकीलों को 29 अक्टूबर 2026 को पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधक अदालत ने वर्ष 2024 के एक सुरक्षा अवरोध हटाने से जुड़े मामले में दोषी करार दिया। फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
ईमान मजारी और हादी अली चठा पाकिस्तान में मानवाधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की पैरवी करते रहे हैं। दोनों अधिवक्ताओं ने विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में कथित जबरन गुमशुदगी, मनमानी गिरफ्तारियों और मानवाधिकार उल्लंघन से प्रभावित परिवारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई है। वे पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े मामलों में भी सक्रिय रहे हैं। ऐसे में दोनों को सुनाई गई सजा को मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर चिंता का विषय बताया है।
पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, रावलपिंडी की अदियाला जेल में स्थापित अदालत में आतंकवाद निरोधक न्यायाधीश ताहिर अब्बास सिपरा ने फैसला सुनाया। दोनों वकीलों को आतंकवाद निरोधक अधिनियम की धारा 7 के तहत 10-10 साल की कैद और एक-एक लाख पाकिस्तानी रुपये के जुर्माने की सजा दी गई। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने और सरकारी कर्मचारी के खिलाफ बल प्रयोग से संबंधित आरोपों में अलग-अलग एक और दो साल की सजा भी सुनाई गई। हालांकि, सभी सजाएं एक साथ चलेंगी, इसलिए प्रभावी कारावास की अवधि 10 साल रहेगी।
यह मामला अक्टूबर 2024 में इंग्लैंड क्रिकेट टीम के पाकिस्तान दौरे के दौरान हुई एक घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि ईमान मजारी और हादी अली चठा ने इस्लामाबाद में सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाए गए अवरोध हटाए और यातायात व्यवस्था में हस्तक्षेप किया। अधिकारियों ने इसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टीम की सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। इसी आधार पर दोनों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून और पाकिस्तान दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
दूसरी ओर, दोनों वकीलों ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया। ईमान मजारी का कहना था कि वह अपने एक मुवक्किल के मामले में अदालत जा रही थीं, लेकिन रास्ते में सुरक्षा अवरोध के कारण उन्हें रोक दिया गया। बचाव पक्ष ने अदालत की कार्यवाही और मामले में अपनाई गई प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनके वकील ने दलील दी कि उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में संबंधित याचिकाएं लंबित होने के कारण फैसला स्थगित किया जाना चाहिए था। हालांकि, अदालत ने फैसला सुनाते हुए दोनों को दोषी ठहराया।
इस घटनाक्रम पर मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। संगठन की वरिष्ठ निदेशक यास्मीन अहमद ने कहा कि यह फैसला पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि आतंकवाद निरोधक कानूनों का इस्तेमाल मानवाधिकारों के पक्ष में आवाज उठाने वाले लोगों को दंडित करने के लिए किया जा रहा है। एमनेस्टी ने दोनों वकीलों की तत्काल रिहाई और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप वापस लेने की मांग की है।
मानवाधिकार संगठन फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने भी अदालत के फैसले की आलोचना की है। संगठन के अनुसार, ईमान मजारी और हादी अली चठा लंबे समय से उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, जिन्होंने सरकारी एजेंसियों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। संगठन ने आशंका जताई कि इस तरह की सजा से अन्य अधिवक्ताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच भय का माहौल पैदा हो सकता है। उसने पाकिस्तान सरकार से दोनों की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने और मानवाधिकार रक्षकों के खिलाफ कथित न्यायिक उत्पीड़न रोकने की अपील की है।
दोनों वकीलों के खिलाफ पहले भी कानूनी मामले दर्ज किए जा चुके हैं। जनवरी 2026 में सोशल मीडिया पर प्रकाशित पोस्ट से जुड़े एक मामले में उन्हें पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम अधिनियम के तहत 17-17 साल की कैद की सजा सुनाई गई थी। उन पोस्ट में पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की आलोचना और बलूच एवं पश्तून कार्यकर्ताओं के प्रति समर्थन व्यक्त किया गया था। बाद में 17 सितंबर 2026 को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा निलंबित करते हुए जमानत मंजूर कर ली थी। हालांकि, जेल से रिहाई से पहले ही उन्हें दूसरे मामले में दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया।
'बलूच वॉयस फॉर जस्टिस' की ओर से फैसले की निंदा ऐसे समय में सामने आई है, जब पाकिस्तान में बलूच समुदाय से जुड़े मानवाधिकार मुद्दों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है। बलूच मानवाधिकार संगठनों का आरोप रहा है कि क्षेत्र में जबरन गुमशुदगी और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में निष्पक्ष जांच तथा न्याय प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयां सामने आती हैं। हालांकि, इन आरोपों और अलग-अलग मामलों की परिस्थितियों पर पाकिस्तानी अधिकारियों तथा अधिकार संगठनों के बीच मतभेद रहे हैं।
इस मामले में ईमान मजारी की मां और पूर्व मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने भी अदालत की कार्यवाही पर आपत्ति जताई है। परिवार का आरोप है कि दोनों को उचित कानूनी प्रतिनिधित्व और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने में बाधाएं आईं। परिवार ने फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने की बात कही है।
पाकिस्तान सरकार के कानून मंत्री आजम नजीर तरार पहले देश की न्यायपालिका को स्वतंत्र बताते रहे हैं। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और प्रभावी कानूनी बचाव का अधिकार मिलना चाहिए।
ईमान मजारी और हादी अली चठा को सुनाई गई 10 साल की सजा ने एक बार फिर पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार अधिवक्ताओं की सुरक्षा और आतंकवाद निरोधक कानूनों के इस्तेमाल पर बहस तेज कर दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उच्च अदालतों में इस फैसले को चुनौती दिए जाने पर क्या कानूनी परिणाम सामने आते हैं।
संपादकीय नोट: 29 अक्टूबर 2026 की सजा और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की प्रतिक्रियाओं की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से होती है। 'बलूच वॉयस फॉर जस्टिस' के कथित बयान का मूल पाठ स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सका है।
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