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Delhi दिल्ली। वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड चर्चा में है। अमेरिका इस पर कब्जा जमाना चाहता है, वो भी ऐसे द्वीप पर जिस पर बर्फ की चादर बिछी रहती है और मई से जुलाई के आखिर तक 24 घंटे दिन की रोशनी रहती है। जीवन दुरूह है, फिर भी अमेरिका और खास तौर पर ट्रंप इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं। आखिर क्यों? डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड में रुचि को लेकर वैश्विक राजनीति में लंबे समय से चर्चा होती रही है। यह रुचि पहली बार व्यापक रूप से तब सामने आई, जब ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को खरीदने की संभावना पर सार्वजनिक रूप से विचार जताया। उस समय कई लोगों को यह बयान अजीब लगा, लेकिन इसके पीछे ठोस भू-राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक कारण मौजूद हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है।
ग्रीनलैंड के लिए ट्रंप की ये लालसा नई नहीं है। 2019 में उन्होंने कहा था कि ये एक 'शानदार रियल एस्टेट' सौदा होगा, हालांकि तब उन्होंने कहा था कि इसे खरीदना उनकी प्राथमिकता नहीं है। 2025 में राष्ट्रपति पद पर दोबारा काबिज होने के साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ कर दिया कि वह चाहते हैं कि यह बड़ी जमी हुई जमीन यूएस का हिस्सा बन जाए। अब जरा इसकी भौगोलिक स्थिति का जिक्र करते हैं। मई से जुलाई के आखिर तक, ग्रीनलैंड में 24 घंटे दिन की रोशनी रहती है। ग्रीनलैंड का 80 प्रतिशत हिस्सा 1.6 मील गहरी बर्फ की परत के नीचे है। लगभग पूरा जमा हुआ आइलैंड रहने लायक नहीं है। आइलैंड—जिसकी आबादी सिर्फ 60,000 है, एक चौथाई लोग राजधानी नुउक में रहते हैं।
ग्रीनलैंड की प्राकृतिक संपदा भी ट्रंप की रुचि का बड़ा कारण मानी जाती है। यहां दुर्लभ खनिजों, तेल और गैस के बड़े भंडार होने की संभावना है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की ओर से 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि यहां का चार लाख वर्ग किलोमीटर का इलाका जो बर्फ से ढका नहीं है उसमें 38 खनिजों के हल्के या भारी भंडार हैं। ये सभी आवश्यक मैटेरियल की यूरोपीय लिस्ट में शामिल हैं। रेयर अर्थ मिनरल्स आधुनिक तकनीक, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहनों और सैन्य उपकरणों के लिए बेहद जरूरी हैं।
यहां कॉपर, ग्रेफाइट, नियोबियम, टाइटेनियम और रोडियम के बड़े भंडार तो हैं ही, साथ ही रेयर अर्थ खनिज का भी अच्छा-खासा भंडार है। यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन का नया केंद्र बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं। इन मार्गों से एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी कम हो सकती है। ऐसे में ग्रीनलैंड पर प्रभाव रखने वाला देश भविष्य के वैश्विक व्यापार और सैन्य गतिविधियों पर भी असर डाल सकता है। भौगोलिक रूप से यह नॉर्थ अमेरिका का हिस्सा है।
अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य रूप से मौजूद है। वहां स्थित पिटुफिक स्पेस बेस, जिसे पहले थुले एयरबेस के नाम से जाना जाता था, अमेरिकी मिसाइल चेतावनी प्रणाली और अंतरिक्ष निगरानी के लिए बेहद अहम है। ट्रंप प्रशासन का मानना रहा कि ग्रीनलैंड में मजबूत अमेरिकी पकड़ से रूस और चीन जैसी शक्तियों की गतिविधियों पर नजर रखना आसान होगा, खासकर रूस, जो आर्कटिक में अपने सैन्य ठिकानों और जहाजों की संख्या लगातार बढ़ा रहा है, और चीन, जो खुद को “निकट-आर्कटिक राष्ट्र” बताकर इस क्षेत्र में निवेश कर रहा है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, "यूएस मिलिट्री का इस्तेमाल इस पर कब्जे का एक विकल्प है।" ट्रंप ने एयर फोर्स वन में कहा था, “अभी, ग्रीनलैंड हर जगह रूसी और चीनी जहाजों से भरा हुआ है। हमें नेशनल सिक्योरिटी के नजरिए से ग्रीनलैंड की जरूरत है।”
हालांकि, ग्रीनलैंड की राजनीतिक स्थिति इस विचार को जटिल बना देती है। ग्रीनलैंड एक स्वशासी क्षेत्र है, लेकिन आधिकारिक तौर पर डेनमार्क के अधीन है। जब ट्रंप ने इसे खरीदने का विचार सामने रखा, तो डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने साफ शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। ग्रीनलैंड के लोगों के लिए यह केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और आत्मनिर्णय का प्रतीक है। इसी कारण ट्रंप का प्रस्ताव कूटनीतिक स्तर पर ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका। डेनमार्क और यूरोपीय संघ के सदस्य दोनों इस बात पर अड़े हैं कि जमीन बिक्री के लिए नहीं है, और वे मिलिट्री हमले पर करारा जवाब देंगे।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड में रुचि नई नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 में भी अमेरिका ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे उस समय ठुकरा दिया गया था। यानी ट्रंप की सोच एक लंबे ऐतिहासिक सिलसिले की ही अगली कड़ी थी, जिसे उन्होंने अपने अलग अंदाज में सामने रखा।
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड में डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी किसी सनक या मजाक भर का मामला नहीं थी। इसके पीछे आर्कटिक में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा, रणनीतिक सैन्य जरूरतें और भविष्य के संसाधनों पर नियंत्रण की सोच छिपी हुई थी। भले ही ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार व्यवहार में संभव न हो, लेकिन इस बहस ने यह जरूर साफ कर दिया कि आने वाले समय में ग्रीनलैंड और पूरा आर्कटिक क्षेत्र विश्व राजनीति में कहीं ज्यादा अहम भूमिका निभाने वाला है।
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