विश्व
धमकियों से हत्या तक पाकिस्तान में महिला TikTokers क्यों बन रहीं निशाना
Ratna Netam
19 Aug 2026 8:25 PM IST

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पाकिस्तान : सोशल मीडिया पर पहचान बनाने वाली महिलाओं की सुरक्षा एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। महिला टिकटॉकर्स और इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ हत्या, धमकी, पीछा करने, ऑनलाइन गालियां और उत्पीड़न की लगातार सामने आती घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि डिजिटल दुनिया में सक्रिय महिलाओं के लिए सार्वजनिक पहचान इतनी खतरनाक क्यों बन रही है। ताजा मामला 28 वर्षीय टिकटॉक क्रिएटर शम्सू बीबी उर्फ आयशा गिलमाना का है, जिनकी 14 अगस्त को टैक्सिला इलाके में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके टिकटॉक पर करीब 13 लाख फॉलोअर्स थे।
पुलिस में दर्ज शिकायत के मुताबिक, आयशा अपने भाई और 15 वर्षीय बहन के साथ वाहन में थीं, तभी मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने फायरिंग की। गोलीबारी के बाद वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। आयशा की मौत हो गई, जबकि उनकी छोटी बहन गंभीर रूप से घायल हुई। उनके पिता ने पुलिस को बताया कि आयशा का कुछ लोगों के साथ पैसों को लेकर विवाद था और उन्हें कथित तौर पर जान से मारने की धमकियां भी मिली थीं। पुलिस मामले की विभिन्न पहलुओं से जांच कर रही है, इसलिए हत्या के मकसद को अभी अंतिम रूप से स्थापित नहीं माना जा सकता।
महिला इन्फ्लुएंसर्स की हत्याओं ने बढ़ाई चिंता
आयशा की हत्या को एक अकेली घटना के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर सक्रिय कई महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। जून 2025 में 17 वर्षीय लोकप्रिय टिकटॉकर सना यूसुफ की इस्लामाबाद स्थित घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या ने पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी चर्चा पैदा की थी।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इन मामलों को महिलाओं के खिलाफ व्यापक हिंसा से जोड़कर देखा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 के शुरुआती छह महीनों में पाकिस्तान में 700 से अधिक महिलाओं की हत्या के मामले सामने आए थे और उनमें करीब एक चौथाई को कथित ‘ऑनर किलिंग’ की श्रेणी में रखा गया। इसी अवधि में सोशल मीडिया गतिविधियों से जुड़े कम से कम आठ महिला हत्या मामलों का भी उल्लेख किया गया था।
सोशल मीडिया पर दिखना क्यों बन रहा खतरा?
पाकिस्तान में लाखों लोग TikTok जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। महिलाओं के लिए इन प्लेटफॉर्म ने अपनी प्रतिभा दिखाने, कमाई करने और स्वतंत्र पहचान बनाने के नए अवसर पैदा किए हैं। लेकिन इसके साथ ही ऑनलाइन उत्पीड़न का खतरा भी बढ़ा है।
महिला क्रिएटर्स को कपड़ों, वीडियो, निजी जीवन और उनकी स्वतंत्रता को लेकर अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ऑनलाइन गालियां धमकी, साइबर स्टॉकिंग या वास्तविक दुनिया में हिंसा तक पहुंच जाती हैं।
2026 में प्रकाशित डिजिटल सुरक्षा पर एक अध्ययन में पाकिस्तान में महिलाओं के खिलाफ साइबर स्टॉकिंग, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन धमकियां, पहचान की चोरी, निजी सामग्री के गैर-सहमति प्रसार और संगठित ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है।
सना यूसुफ केस ने दिखाया था खतरा
सना यूसुफ की हत्या के बाद महिला सोशल मीडिया क्रिएटर्स की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल उठा था। रिपोर्टों के मुताबिक, वह फैशन, लाइफस्टाइल और अपनी संस्कृति से जुड़ा कंटेंट साझा करती थीं। उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया पर ऐसे कमेंट भी सामने आए जिनमें घटना के लिए पीड़िता की ऑनलाइन मौजूदगी को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई।
यही रवैया महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का विषय है। उनका तर्क है कि हिंसा की जिम्मेदारी अपराधी पर रखने के बजाय कई बार महिला के कपड़ों, जीवनशैली या सोशल मीडिया गतिविधियों पर सवाल खड़े किए जाते हैं।
कंदील बलोच से अब तक सवाल वही
पाकिस्तान में महिला सोशल मीडिया स्टार के खिलाफ हिंसा का सबसे चर्चित उदाहरण कंदील बलोच का रहा है। 2016 में उनकी हत्या उनके भाई ने कर दी थी। उस घटना ने तथाकथित ‘ऑनर किलिंग’ और महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बड़ी बहस शुरू की थी। लगभग एक दशक बाद भी महिला इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ हिंसा की नई घटनाएं यह दिखाती हैं कि समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
सड़क पर भी सुरक्षित नहीं रहीं महिला क्रिएटर्स
ऑनलाइन उत्पीड़न के अलावा सार्वजनिक जगहों पर भी महिला टिकटॉकर्स के साथ हिंसा के मामले सामने आए हैं। अगस्त 2021 में लाहौर के ग्रेटर इकबाल पार्क में वीडियो बना रही एक महिला टिकटॉकर पर सैकड़ों लोगों की भीड़ ने हमला किया था। पुलिस ने उस मामले में सैकड़ों अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
इस घटना ने दिखाया था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता हासिल करने वाली महिलाओं को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
गालियों से शुरू होकर धमकी तक पहुंचता मामला
महिला क्रिएटर्स के लिए ऑनलाइन ट्रोलिंग केवल कुछ खराब कमेंट तक सीमित नहीं रहती। कई मामलों में लगातार पीछा करना, धमकियां देना, निजी जानकारी सार्वजनिक करना और तस्वीरों या वीडियो का गलत इस्तेमाल करना बड़ी समस्या बन सकता है।
पाकिस्तान में ऑनलाइन महिला उत्पीड़न की समस्या पहले भी मानवाधिकार संगठनों की चिंता का विषय रही है। शिकायत व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद पीड़ित महिलाओं के लिए समय पर प्रभावी कार्रवाई और सुरक्षा हासिल करना चुनौतीपूर्ण बताया जाता रहा है।
सोशल मीडिया ने महिलाओं को दी नई आजादी
इस पूरी बहस का दूसरा पहलू यह है कि सोशल मीडिया ने पाकिस्तान की महिलाओं को पारंपरिक मीडिया से अलग अपनी आवाज और पहचान बनाने का मौका दिया है। छोटे शहरों और अपेक्षाकृत रूढ़िवादी इलाकों की युवतियां भी लाखों लोगों तक पहुंच सकती हैं।
वे फैशन, शिक्षा, मनोरंजन, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी पर कंटेंट बनाकर लोकप्रिय हो रही हैं। कई महिलाओं के लिए यही लोकप्रियता आय का जरिया भी बनती है। लेकिन जैसे-जैसे उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बढ़ती है, उन्हें नियंत्रित करने या चुप कराने की कोशिशों का जोखिम भी बढ़ सकता है।
कानून होने के बावजूद चुनौती क्यों?
पाकिस्तान में साइबर अपराध और ऑनलाइन उत्पीड़न से निपटने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद डिजिटल उत्पीड़न की शिकायतों से लेकर वास्तविक सुरक्षा उपलब्ध कराने तक कई चुनौतियां बनी हुई हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि डिजिटल हिंसा और वास्तविक दुनिया की हिंसा को अलग-अलग समझना हमेशा सही नहीं होता। किसी महिला को लगातार मिल रही ऑनलाइन धमकियां आगे चलकर उसके लिए वास्तविक सुरक्षा खतरे का संकेत हो सकती हैं।
केवल टिकटॉक की समस्या नहीं
इन घटनाओं को केवल TikTok की समस्या कहना भी उचित नहीं होगा। मूल सवाल महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक सोच, ऑनलाइन उत्पीड़न और कानून लागू करने की क्षमता से जुड़ा है। सोशल मीडिया ने समस्या पैदा करने के साथ-साथ पहले से मौजूद लैंगिक हिंसा को ज्यादा दिखाई देने वाला भी बनाया है।
महिला चाहे टिकटॉक पर वीडियो बनाए, नौकरी करे या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो, उसकी सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना राज्य और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
आयशा गिलमाना की हत्या की जांच अभी जारी है और इसके वास्तविक मकसद का फैसला जांच के बाद ही होगा। लेकिन एक के बाद एक सामने आई घटनाओं ने बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या सोशल मीडिया पर स्वतंत्र पहचान बनाने वाली महिलाओं के खिलाफ धमकी और हिंसा को सामान्य मान लेने वाली सोच को बदलने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं?
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