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नई दिल्ली: एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने अपने बजट में सैन्य उपकरणों पर खर्च को प्राथमिकता दी है, जबकि लोगों के बीच बढ़ती भूख और कुपोषण के बावजूद भोजन और स्वास्थ्य के लिए आवंटित राशि में कटौती की है।
2026-27 के संघीय बजट में रक्षा सेवाओं के लिए 3 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये (PKR) आवंटित किए गए हैं, जो 17.6 प्रतिशत की वृद्धि है। इसमें हथियारों की खरीद के लिए 925.8 अरब पाकिस्तानी रुपये का प्रावधान है, जो 39.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कुल 53.3 अरब पाकिस्तानी रुपये आवंटित किए गए, जिसमें से 24.3 अरब रुपये स्वास्थ्य और पोषण विकास कार्यों के लिए हैं। 'यूरोपियन टाइम्स' न्यूज़ पोर्टल के एक लेख के अनुसार, सैन्य पेंशन के लिए अलग से 822 अरब पाकिस्तानी रुपये रखे गए हैं, जो स्वास्थ्य क्षेत्र के कुल आवंटन से 15 गुना से भी अधिक है।
लेख में कहा गया है, "सरकार के अपने 'आर्थिक सर्वेक्षण' के अनुसार, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 0.8 प्रतिशत है। जो देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले हर एक रुपये के मुकाबले अपनी सेना पर लगभग 56 पाकिस्तानी रुपये खर्च करता है, उसने स्पष्ट कर दिया है कि उसके लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है।"
इसमें बताया गया है कि 2026 के 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स' (वैश्विक भूख सूचकांक) में पाकिस्तान का स्कोर 25.5 रहा, जिससे वह 122 देशों की सूची में 106वें स्थान पर है। यह दक्षिण एशिया के अन्य सभी सक्रिय देशों की तुलना में बदतर स्थिति है। श्रीलंका, जिसने 2022 में अपने विदेशी कर्ज पर डिफॉल्ट किया था और उसके बाद के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रम के तहत रहा, उसका स्कोर 10.2 है—जो दक्षिण एशिया में भूख का सबसे निचला स्तर है। बांग्लादेश का स्कोर 19.2 और नेपाल का 14.5 है (दोनों मध्यम स्तर पर हैं), जबकि भारत का स्कोर 24.1 है।
लेख में कहा गया है, "पाकिस्तान में भूख की स्थिति बिगड़ने के पीछे कोई बाहरी कारण नहीं है, जबकि पड़ोसी देश, जो समान जलवायु और वस्तुओं की कीमतों का सामना कर रहे हैं, इस स्थिति से बचने में सफल रहे हैं।"
इसमें आंकड़ों के रुझान का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2018 के बाद से कुपोषण का स्तर 'कम' से बढ़कर 'मध्यम' श्रेणी में आ गया है, और बच्चों में 'वेस्टिंग' (उम्र के हिसाब से वजन में भारी कमी) का स्तर 'उच्च' सीमा की ओर बढ़ गया है। पाकिस्तान उन उपलब्धियों को गंवा रहा है जो पिछली सरकारों ने हासिल की थीं। यह सब उस दौर में हो रहा है, जब सेना के इशारे पर चल रही एक नागरिक सरकार ने नीतियों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है।
मौजूदा आंकड़े एक ऐसी 'जन स्वास्थ्य आपातकाल' (public health emergency) की ओर इशारा करते हैं, जिसे इस्लामाबाद ने आपातकाल मानने से ही इनकार कर दिया है। यहां 16.1 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है; 5 साल से कम उम्र के बच्चों में 'स्टंटिंग' (उम्र के हिसाब से कद कम होना) 33.6 प्रतिशत, 'वेस्टिंग' (कद के हिसाब से वजन कम होना) 9.8 प्रतिशत और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 5.6 प्रतिशत है।
इसके अलावा, IMF बेलआउट प्रोग्राम के तहत किए गए सुधारों के चलते पाकिस्तान ने गेहूं के लिए 'सपोर्ट प्राइस' (न्यूनतम समर्थन मूल्य) व्यवस्था को खत्म कर दिया। इसके बाद, गेहूं की खरीद प्रक्रिया बुरी तरह लड़खड़ा गई; पंजाब में 30 लाख (3 मिलियन) टन का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन खरीद गिरकर महज 4.8 लाख (0.48 मिलियन) टन रह गई।
इस वजह से देश के खाद्य भंडार में भारी कमी आ गई, जिसके चलते पाकिस्तान को लगभग 35 लाख (3.5 मिलियन) टन गेहूं आयात करना पड़ा, जिस पर 1 अरब डॉलर से अधिक की लागत आई। लेख में आगे कहा गया है कि पाकिस्तान को अभी भी ऐसी ही कमी का सामना करना पड़ रहा है। किसान प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि गेहूं की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे आटा आम पाकिस्तानी नागरिकों की पहुंच से बाहर हो सकता है।
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