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वेटर बनकर इंजीनियर जीवन-यापन कर रहा, AI को बताया बर्बादी का कारण

Nilmani Pal
3 May 2026 3:00 PM IST
वेटर बनकर इंजीनियर जीवन-यापन कर रहा, AI को बताया बर्बादी का कारण
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दुःख भरी कहानी। एआई की वजह से हो रही बड़ी टेक कंपनियों में छंटनी को लेकर एक और घटना सामने आई है. लेकिन उसके पहले सोचिए कि आपने अपनी जिंदगी के 18 साल जिस स्किल को निखारने में लगा दिए, जिसे अपना जुनून बनाया वो एक झटके में किसी मशीनी दिमाग के आगे छोटा पड़ जाए. यह घटना ऐसे ही एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की है, जिसके पास लगभग दो दशकों का अनुभव था, लेकिन वक्त की मार और AI के बढ़ते ट्रेंड ने उसे कीबोर्ड छोड़कर मैकडॉनल्ड्स के काउंटर पर खड़ा कर दिया.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर एक एक यूजर का पोस्ट वायरल हो गया है, जिसमें वह दावा कर रहा है कि करीब 18 साल के अनुभव वाले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को कंपनी ने एआई के कारण नौकरी से निकाल दिया. अब वह अपना किराया चुकाने के लिए वह मैकडॉनल्ड्स में काम कर रहा है. यह पोस्ट रेडिट के r/ClaudeAI ने पोस्ट किया है. यूजर ने लिखा कि उन्होंने 18 साल तक सॉफ्टवेयर डेवलपर के रूप में काम किया, लेकिन आठ महीने पहले उनकी नौकरी चली गई. उनके मुताबिक, कंपनी ने 12 इंजीनियरों की टीम को हटाकर सिर्फ दो एआई एक्सपर्ट्स रख लिए. तब से उन्होंने 100 से ज्यादा नौकरियों के लिए आवेदन किया, लेकिन अब तक उन्हें नई नौकरी नहीं मिल पाई है. फिलहाल गुजारा करने और किराया भरने के लिए वह मैकडॉनल्ड्स में काम कर रहे हैं.

उन्होंने अपने इंटरव्यू के खराब अनुभव भी साझा किया. उनका कहना है कि हायरिंग मैनेजर अक्सर उनसे पूछते हैं कि वे किसी नए या अनजान कोडबेस को कैसे समझेंगे, लेकिन उनके जवाबों से संतुष्ट नहीं होते. उन्होंने यह भी बताया कि एक एचआर इंटरव्यू में तो उनसे साफ कहा गया कि डेवलपर अब पुराने जमाने की बात हो गए हैं और कंप्यूटर साइंस की डिग्री की अब उतनी अहमियत नहीं रही. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कई अनुभवी इंजीनियर भी इसी समस्या का सामना कर रहे हैं. उन्होंने लिखा कि मैं 200 से अधिक ऐसे डेवलपर्स को जानता हूं जो ऐसी ही स्थिति में हैं और बताया कि कुछ ने अलग ही नौकरियां ले ली हैं जबकि अन्य ने नौकरी की तलाश पूरी तरह से बंद कर दी है.

पोस्ट में उन्होंने आगे लिखा कि अब कंपनियां एआई टूल्स की मदद से छोटी टीमों के साथ काम करना पसंद कर रही हैं. कुछ लोग जो एआई को सही तरह से निर्देश दे सकते हैं, वही काम कर रहे हैं जिसके लिए पहले बड़ी इंजीनियरिंग टीम की जरूरत होती. ऐसे फैसले लेने वाले अधिकारी खुद इन छंटनी के असर को महसूस नहीं करते बल्कि इसका बोझ कर्मचारियों को उठाना पड़ता है.

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