
वर्ल्ड | बलूचिस्तान की जमीं पर एक गांधीवादी आंदोलनकारी उभरकर आई हैं—डॉ. मेहरंग बलोच। शांतिपूर्ण संघर्ष की राह अपनाने वाली इस महिला ने अपने आंदोलन से पाकिस्तानी हुकूमत को झुकने पर मजबूर कर दिया। उनके इसी साहस और दृढ़ता के कारण उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है।
"पिता की हत्या से मिली ताकत"
डॉ. मेहरंग बलोच का जीवन हमेशा से संघर्ष से भरा रहा है। उनके पिता, जो खुद भी एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए। इस घटना ने मेहरंग को अंदर से झकझोर दिया, लेकिन उन्होंने हथियार उठाने की बजाय अहिंसा का रास्ता चुना।
"गांधीवादी आंदोलन का नेतृत्व"
बलूचिस्तान में गुमशुदा लोगों, मानवाधिकार उल्लंघन और राजनीतिक दमन के खिलाफ उन्होंने एक शांतिपूर्ण जन आंदोलन की शुरुआत की। सरकार के तमाम दबावों के बावजूद, उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचा।
"नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन"
डॉ. मेहरंग बलोच की अहिंसक संघर्ष नीति और मानवाधिकारों के प्रति समर्पण को देखते हुए उन्हें 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है। यह न केवल बलूचिस्तान के आंदोलन के लिए एक ऐतिहासिक पल है, बल्कि पूरी दुनिया में शांतिपूर्ण संघर्ष की ताकत को भी दर्शाता है।
"आगे क्या?"
नोबेल पुरस्कार की दौड़ में उनका नाम आना बलूचिस्तान के संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकता है। अगर उन्हें यह सम्मान मिलता है, तो यह न्याय और मानवाधिकारों की जीत मानी जाएगी।





