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पंजशीर, ताजिकिस्तान से हुआ डिस्कनेक्ट, जानें इस बार क्यों भारी पड़ रहा तालिबान

Renuka Sahu
9 Sep 2021 5:31 AM GMT
पंजशीर, ताजिकिस्तान से हुआ डिस्कनेक्ट, जानें इस बार क्यों भारी पड़ रहा तालिबान
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फाइल फोटो 

अफगानिस्तान में तालिबानकी सरकार बन चुकी है. देश में अब तक अजेय माना जाने वाले एकमात्र प्रांत पंजशीर में नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट यानी नॉर्दन अलायंस की लड़ाई भी अब कमजोर पड़ती दिख रही है.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। अफगानिस्तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) की सरकार बन चुकी है. देश में अब तक अजेय माना जाने वाले एकमात्र प्रांत पंजशीर (Panjshir) में नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट (NRF) यानी नॉर्दन अलायंस की लड़ाई भी अब कमजोर पड़ती दिख रही है. क्योंकि, इतिहास में पहली बार नॉर्दर्न अलायंस अपने उत्तर में ताजिकिस्तान से कट गया है. तालिबानी लड़ाके घाटी में दाखिल हो गए और कब्जे का दावा किया है. हालांकि, नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट (NRF) का कहना है कि जंग अभी जारी है.

NRF के नेता अहमद मसूद ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में तालिबान के सामने शांति का प्रस्ताव रखा और तालिबान ने उसे खारिज कर दिया. ऐसी खबरें भी हैं कि अमरुल्ला सालेह और अहमद मसूद ताजिकिस्तान चले गए हैं. पंजशीर में NRF की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही.
तालिबान ने इस बार ताजिकिस्तान की सप्लाई लाइन बंद कर दी है. 1990 में जब तालिबान अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर काबिज हो गया था, तब भी ताजिकिस्तान से पंजशीर घाटी के लिए सप्लाई लाइन को चालू रखा गया था. मगर इस बार ऐसा नहीं किया गया. इसके नतीजे के रूप में घाटी में मौजूद नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट (NRF) को खाने और ईंधन के अलावा हथियार और गोला-बारूद की सप्लाई नहीं हो पा रही है.
तालिबान ने इसके साथ ही काबुल से आने वाली मुख्य सड़क को भी ब्लॉक कर दिया है. इस वजह से भी घाटी में जरूरी सामान की भारी कमी हो गई थी. अमरुल्लाह सालेह कई बार ये मामला उठा चुके हैं. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को इस मामले में चिट्ठी भी लिखी थी. घाटी में मेडिकल सप्लाई की भी किल्लत हो रही है.
पुराने दोस्तों ने भी पंजशीर को अकेला छोड़ दिया है. अहमद मसूद एक मैसेज में ये बात स्वीकार कर चुके हैं कि उन्होंने अमेरिका समेत कुछ देशों से हथियार और अन्य सप्लाई की मांग की थी, मगर इन्हें पूरा करने से मना कर दिया गया. दरअसल, नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट (NRF) के नेता अहमद मसूद से पहले उनके पिता अहमद शाह मसूद की ईरान से लेकर अमेरिका तक कई देशों ने मदद की थी. इनमें हथियारों और सैनिक साजो-सामान के साथ बाकी जरूरी सप्लाई भी शामिल थी. मगर बेटे अहमद मसूद के साथ ऐसा नहीं हुआ.
चूंकि पंजशीर को जोड़ने वाले रास्ते बंद कर दिए गए हैं. ऐसे में अगर किसी को किसी को पंजशीर जाना है, तो उसे पड़ोसी कपिला प्रांत के पहाड़ों से होते हुए लंबा सफर तय करना होगा. यह रास्ता ऐसा नहीं कि किसी भी तरह सैन्य मदद पंजशीर घाटी तक पहुंचाई जा सके. शायद इसलिए दूसरे देशों ने मदद से इनकार कर दिया है.
इसके अलावा पंजशीर में तालिबान ने इंटरनेट और टेलिफोन की लाइंस काट दी हैं. ऐसे में सही जानकारी सामने नहीं आ रही. नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट (NRF) घाटी से बाहर से किसी तरह की सूचना नहीं भेज पा रहे हैं. मीडिया ब्लैकआउट के चलते तालिबान के साथ चल रही जंग को लेकर बाहर आ रही सूचनाएं एकतरफा हैं.
वहीं, जानकारों का कहना है कि नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट (NRF) के मौजूदा नेता अहमद मसूद लंदन के किंग्स कॉलेज के अलावा ब्रिटेन के सैंडहर्स्ट में रॉयल मिलिट्री कॉलेज से पढ़ने के बावजूद अपने पिता अहमद शाह मसूद की तरह गोरिल्ला युद्ध में माहिर नहीं हैं. अहमद शाह मसूद के समय सोवियत संघ की लाल सेना और बाद में तालिबान कभी पंजशीर पर काबिज नहीं हो सके थे. इस बार तालिबान पंजशीर पर भारी पड़ रहा है.
इसके अलावा पाकिस्तानी मदद भी तालिबान के पक्ष में गेम चेंजर साबित हुई है. हाल ही में पंजशीर में पाकिस्तानी सेना ने ड्रोन अटैक किए थे. एनआरएफ ने इसकी पुष्टि भी की थी.


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