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अमेरिका में सत्ता का खेल बदला
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों—प्रतिनिधि सभा और सीनेट—में बहुमत हासिल कर लिया है। इस चुनावी उलटफेर के बाद अमेरिका की राजनीति में सत्ता का संतुलन बदल गया है। अब सवाल उठ रहा है कि इस बदलाव का भारत-अमेरिका संबंधों, व्यापार समझौतों, आयात शुल्क, एच-1बी वीजा और रक्षा सहयोग पर क्या असर पड़ेगा।
अमेरिका में 3 नवंबर को हुए मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की नीतियों की बड़ी परीक्षा माने जा रहे थे। चुनाव में महंगाई, रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतें, आयात शुल्क और ईरान युद्ध जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। नतीजों में रिपब्लिकन पार्टी को दोनों सदनों में नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे, लेकिन अब उन्हें अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए डेमोक्रेटिक बहुमत वाली कांग्रेस का सामना करना होगा। भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल व्यापार और टैरिफ का है। पिछले कुछ समय से अमेरिका की व्यापार नीतियों और आयात शुल्क को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच, निर्यातकों की लागत और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर इन फैसलों का असर पड़ता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत में आने से ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति पर संसदीय निगरानी बढ़ सकती है। डेमोक्रेटिक सांसद आयात शुल्क से अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर प्रशासन से सवाल पूछ सकते हैं। इससे भारत समेत अमेरिका के व्यापारिक साझेदारों के साथ बातचीत के स्वरूप में बदलाव की संभावना है। हालांकि केवल चुनाव परिणाम आने से भारतीय उत्पादों पर शुल्क अपने आप कम नहीं होंगे। भारत-अमेरिका संबंधों में दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा एच-1बी वीजा है। अमेरिका की तकनीकी कंपनियों में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर काम करते हैं। वीजा नियमों में बदलाव का असर भारतीय आईटी कर्मचारियों, विद्यार्थियों और अमेरिकी कंपनियों की नियुक्ति प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए अवसर बढ़ाने के समर्थक नेता मौजूद हैं। हालांकि पार्टी में श्रमिक अधिकारों और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों को प्राथमिकता देने वाले सांसद भी हैं। ऐसे में यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि डेमोक्रेट्स की जीत से एच-1बी वीजा नियम तुरंत आसान हो जाएंगे।
रक्षा और रणनीतिक सहयोग के मामले में भारत और अमेरिका के संबंध किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, चीन के बढ़ते प्रभाव, उन्नत तकनीक, रक्षा उपकरण और समुद्री सुरक्षा जैसे विषय दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए अमेरिकी संसद में सत्ता परिवर्तन के बावजूद इन क्षेत्रों में सहयोग जारी रहने की संभावना है।
तकनीकी हस्तांतरण और रणनीतिक साझेदारी से जुड़े प्रस्तावों पर संसदीय समितियों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। डेमोक्रेटिक सांसद प्रशासन से विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर विस्तृत जवाब मांग सकते हैं। इससे कुछ प्रक्रियाओं में अधिक जांच-पड़ताल और देरी भी संभव है। रूस से भारत के संबंध और ऊर्जा खरीद का मुद्दा भी दोनों देशों के बीच चर्चा का विषय बना रह सकता है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता रहा है, जबकि अमेरिका की रूस संबंधी प्रतिबंध नीति का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ता है। नई कांग्रेस के आने से इन मुद्दों पर बहस का तरीका बदल सकता है, लेकिन नीतिगत मतभेद पूरी तरह समाप्त होने की गारंटी नहीं है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप के सामने अब पहले की तुलना में अधिक मजबूत संसदीय विपक्ष होगा। डेमोक्रेट्स बजट, विधायी प्रस्तावों और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठा सकेंगे। लेकिन राष्ट्रपति के पास विदेश नीति और कार्यकारी निर्णयों से जुड़ी महत्वपूर्ण शक्तियां बनी रहेंगी। इसलिए अमेरिकी नीतियों में बदलाव अचानक होने के बजाय चरणबद्ध तरीके से सामने आ सकता है।
विशेषज्ञों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि डेमोक्रेटिक नेतृत्व व्यापार नीति पर किस हद तक द्विदलीय सहमति बना पाता है। अमेरिकी उद्योगों की सुरक्षा, रोजगार और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर दोनों प्रमुख दलों के बीच कुछ समानताएं भी हैं। भारत के लिए इस राजनीतिक बदलाव में अवसर और चुनौतियां दोनों मौजूद हैं। एक ओर टैरिफ संबंधी फैसलों की समीक्षा और व्यापार वार्ता में अधिक संतुलन की संभावना बन सकती है। दूसरी ओर वीजा, रूस से ऊर्जा खरीद और घरेलू अमेरिकी उद्योगों के संरक्षण जैसे मुद्दों पर दबाव जारी रह सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स की जीत भारत-अमेरिका रिश्तों में तत्काल बदलाव की गारंटी नहीं है, लेकिन इससे आने वाले दो वर्षों की बातचीत और नीतिगत प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है। भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ संवाद बनाए रखने के साथ-साथ अमेरिकी कांग्रेस के दोनों दलों से संबंध मजबूत करे
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